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रविवार

टेलीविजन कार्यक्रमों के प्रकार (Types of T.V. Programs)

Dr Awadhesh K. Yadav (Assistant Professor)     अक्टूबर 12, 2025    

 मानव जीवन में विविधताओं का भंडार है। खाना-पीना हो या कपड़ा पहनना, मित्र बनाना हो या मनोरंजन करना, पढ़ना-लिखना हो या सफर करना... सभी जगह विविधा उपलब्ध है। इसीलिए कहा जाता है कि-‘विभिन्नता में ही जीवन का रस है।‘ यहीं हाल टेलीविजन चैनलों पर प्रसारित कार्यक्रमों का भी है, क्योंकि टेलीविजन ऑन करने के बाद चैनल बदलते ही कार्यक्रम भी बदल जाते हैं। यहीं कारण है कि परिवार के सदस्य टेलीविजन का रिमोट बार-बार एक दूसरे से लेने का प्रयास करते हैं। कई बार एक ही समय में मां की पसंद का भजन-कीर्तन, बहन की पंसद का धारावाहिक, पिता के पसंद का समाचार और भाई के पसंद का क्रिकेट मैच प्रसारित होता है। ऐसी स्थिति में किसी एक को ही अपने पसंद का कार्यक्रम देखने को मिलता है तथा अन्य को नहीं।  

इस प्रकार, टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों में विविधता होती है। कुछ कार्यक्रम निर्माता-निर्देशक के कल्पना की उपज होते हैं तो कुछ कार्यक्रम जीवन के यथार्थ का अनुभव कराने वाले। कुछ कार्यक्रम सच्ची घटनाओं पर आधारित होते हैं तो कुछ कार्यक्रम वास्तविकता और कल्पना का मिश्रण होता है। इस आधार पर टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों के निम्नलिखित प्रकार हैं:-  

(A) निर्माण के आधार पर

  1. फिक्शन प्रोग्राम (Fiction Program) : टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले वे कार्यक्रम जो काल्पनिक कहानियों, पात्रों और घटनाओं पर आधारित होते हैं, उन्हें फिक्शन प्रोग्राम कहते हैं। ऐसे प्रोग्राम दर्शकों को एक काल्पनिक दुनिया में ले जाते हैं, जो कहानी लेखकों की रचनात्मकता और कल्पना पर आधारित होते है। फिक्शन प्रोग्रामिंग का उद्देश्य मुख्य रूप से मनोरंजन करना होता है, हालांकि यह सामाजिक मुद्दों को उठाने, भावनात्मक प्रभाव डालने तथा दर्शकों को प्रेरित करने का भी काम कर सकता है। टेलीविजन पर दीर्घकाल तक प्रसारित होने वाले धारावाहिक- ताड़क मेहता का उल्टा चश्मा (सब टीवी), ये रिश्ता क्या कहलाता है (स्टार प्लस), पवित्र रिश्ता (जी टीवी), हमलोग, घर एक मदिर, क्योंकि सास भी कभी बहू थी (दूरदर्शन) इत्यादि टेलीविजन पर दीर्घकाल तक प्रसारित होने वाले फिक्शन प्रोग्राम हैं। ऐसे फिक्शन प्रोग्राम दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़कर तनाव को कम करने, हँसी प्रदान करने और सामाजिक संदेश देने में सक्षम होते हैं। 
  2. नॉन-फिक्शन प्रोग्राम (Non-Fiction Program) : टेलीविजन पर ऐसे कार्यक्रम भी प्रसारित किये जाते है जो देश-दुनिया व पास-पड़ोस में होने वाली सच्ची घटनाओं पर आधारित होते हैं, जो वास्तविक आंकड़ों और तथ्यों को प्रस्तुत करते हैं। इन कार्यक्रमों के प्रसारण का उद्देश्य समकालीन मुद्दों पर दर्शकों को शिक्षित करना होता हैं। ऐसे कार्यक्रमों को नॉन-फिक्शन प्रोग्राम कहते हैं। डॉक्यूमेंट्री, चैट शो, गीत-संगीत, नृत्य-शो, खेलकूद के कार्यक्रम, क्विज-शो, साक्षात्कार, परिचर्चा इत्यादि नॉन-फिक्शन प्रोग्राम हैं। नॉन-फिक्शन प्रोग्राम की रिकार्डिंग वास्तविक लोकेशन पर की जाती है, जो दर्शकों को वास्तविक दुनिया से जोड़ते हैं। 
  3. मिक्स्ड प्रोग्राम (Mixed Program): टेलीविजन पर कूुछ ऐसे कार्यक्रम भी प्रसारित होते हैं, जिनमें यर्थाथ के साथ-साथ कल्पना का मिश्रण भी होता है। ऐसे कार्यक्रमों को मिश्रित कार्यक्रम कहते हैं। जी टीवी पर प्रसारित धारावाहिक ‘जोधा अकबर‘ मिश्रित कार्यक्रम है, जिसका आधार भारतीय इतिहास है। यह बात अलग है कि दर्शको का मनोरंजन करने के लिए उसका काल्पनिक अभिनय किया गया है। दूरदर्शन पर प्रसारित रामायण, महाभारत, श्रीकृष्ण इत्यादि मिश्रित कार्यक्रम के उदाहरण हैं।

(B) प्रस्तुति के आधार पर 

  1. लाइव प्रोग्राम (Live Program) : अंग्रेजी भाषा के शब्द ‘लाइव‘ का शाब्दिक अर्थ ‘सीधा‘ होता है। टेलीविजन प्रसारण के क्षेत्र में लाइव का तात्पर्य भी सीधा प्रसारण ही होता है। लाइव प्रसारण में ओबी वैन (आउट ब्राडकास्टिंग वैन) का उपयोग किया जाता है, जिसमें एक छोटे से वाहन के ऊपर छतरी लगी होती है तथा अंदर टेलीविजन प्रसारण का सामान रखा होता है, जिसके माध्यम से कैमरे के सामने के दृश्य को सीधा टेलीविजन स्क्रीन पर प्रसारित किया जाता है। वर्तमान समय में ओबी वैन की सहायता से क्रिकेट मैच, लालकिला के प्राचीर से प्रधानमंत्री के अभिभाषण, राजनीतिक दलों, केंद्र व राज्य सरकार के मंत्रियों व जिम्मेदार व्यक्तियों के प्रेस कॉन्फ्रेेस का लाइव प्रसारण किया जाता है। ऐसे कार्यक्रमों को लाइव कार्यक्रम कहा जाता है।  
  2. पैकेज्ड प्रोग्राम (Packaged Program) : वर्तमान समय में टेलीविजन चैनलों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण पैकेज्ड कार्यक्रमों का महत्व बढ़ गया है। पैकेज्ड से तात्पर्य किसी कार्यक्रम को सजाकर टेलीविजन स्क्रीन पर प्रदर्शित करना है, क्योंकि प्रारंभ में टेलीविजन पर कार्यक्रमों का प्रसारण बड़े ही सामान्य तरीके से किया जाता था। एक सादे मेज के सामने बैठकर एंकर समाचार को पढ़ मात्र देता था, किन्तु वर्तमान समय में ऐसा नहीं है। न्यू तकनीकी के आगमन के कारण समाचार ही नहीं अपितु सभी कार्यक्रमों को सजाने-सवारने के बाद दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया जाता है। इसमें रंग, सिग्नेचर ट्यून, स्क्रिप्ट तथा वीडियो फुटेज का विशेष योगदान होता है।
  3. मिक्स्ड प्रोग्राम (Mixed Program) : टेलीविजन पर कुछ ऐसी प्रस्तुति भी होती हैं, जिनमें लाइव और पैकेज्ड तत्वों का संयोजन होता है। ऐसी प्रस्तुति को मिक्स्ड प्रोग्राम कहते हैं। यह प्रोग्रामिंग दर्शकों को दोनों का सर्वश्रेष्ठ अनुभव कराते हैं, क्योंकि इनमें लाइव की तात्कालिकता और पैकेज्ड की गुणवत्ता होती है। रियलिटी शो इंडियन आइडियन मिक्स्ड प्रोग्राम का उदाहरण है, क्योंकि इसमें लाइव परफॉर्मेंस के साथ-साथ पहले से रिकॉर्डेड बैकग्राउंड स्टोरीज़ भी होती हैं। मिक्स्ड प्रोग्राम दर्शकों को एक गतिशील और आकर्षक अनुभव प्रदान करते हैं। यह लाइव की ताज़गी और पैकेज्ड की पॉलिश्ड प्रस्तुति को मिलाकर दर्शकों को बांधते है।

टेलीविजन प्रोग्रामों की विविधता, चाहे वह प्रकृति (फिक्शन, नॉन-फिक्शन, मिक्स्ड) के आधार पर हो या प्रस्तुति (लाइव, पैकेज्ड, मिक्स्ड) के आधार पर दर्शकों को मनोरंजन, शिक्षा और प्रेरणा प्रदान करते है। फिक्शन प्रोग्राम्स दर्शकों को काल्पनिक दुनिया में ले जाते हैं, नॉन-फिक्शन वास्तविकता से जोड़ते हैं और मिक्स्ड दोनों का संतुलन बनाते हैं। इसी तरह, लाइव प्रोग्रामिंग तात्कालिकता और उत्साह प्रदान करती है, पैकेज्ड प्रोग्रामिंग गुणवत्ता व नियंत्रण सुनिश्चित करती है। मिक्स्ड प्रोग्राम दोनों का सर्वश्रेष्ठ मिश्रण होता है। यह विविधता सुनिश्चित करती है कि हर दर्शक के लिए टेलीविजन पर कुछ न कुछ है।


टेलीविजन की ताकत और कमजोरी (Strengths and weaknesses of television)

Dr Awadhesh K. Yadav (Assistant Professor)     अक्टूबर 12, 2025    

 टेलीविजन की मदद से किसी भी घटना से जुड़ी तस्वीरों को न केवल आंखों से देखा जा सकता है, बल्कि उससे जुड़ी जानकारियों को कानों से सुना भी जा सकता है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि आंखों से देखी गई घटनाएं मानव को अधिक समय तक याद रहती हैं तथा उनका प्रभाव भी जीवन पर काफी अधिक पड़ता है। यह टेलीविजन की निम्नलिखित ताकतों के कारण ही संभव होता है। 

1. दृश्य-श्रव्य माध्यम: टेलीविजन संचार का दृश्य-श्रव्य माध्यम है, क्योंकि इसकी सहायता से हम मात्र सूचना/जानकारी को प्राप्त ही नहीं कर सकते हैं, अपितु उन्हें देख और सुन भी सकते हैं। अतः यह संचार का ऐसा माध्यम है जो दृश्यों और ध्वनियों को सम्मिश्रित कर प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।

2. दर्शकों की विविधता: टेलीविजन भिन्न-भिन्न प्रकृति के लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, जो न केवल भौगोलिक दृष्टि से अलग-अलग होते हैं, बल्कि शैक्षणिक, रुचि, अनुभव, सामाजिक, आर्थिक, लिंग, धर्म, समुदाय, संस्कृति आदि के आधार पर भी विविधता होती है।

3. प्रसारण की गति: रेडियो की तुलना में टेलीविजन के माध्यम से भेजी जाने वाली सूचना अपेक्षाकृत धीमी गति से पहुँचती है, क्योंकि तकनीकी जटिलताओं व बाध्यताओं के कारण विभिन्न घटनाओं में समय लगता है, किन्तु अपने दर्शकों के पास लगभग एक ही समय में पहुंचती हैं।

4. आर्थिक पक्ष: टेलीविजन संचार का सस्ता माध्यम है, जिसके चलते कम आय के लोग भी आसानी से खरीद लेते हैं। बाजार में प्रतिस्पर्धा के चलते आसान किश्तों में टेलीविजन उपलब्ध है, जिसके चलते जन-सामान्य तक इसकी पहुंच हो गई है। 

5. एकाग्रता में वृद्धि: टेलीविजन कार्यक्रम देखने और समझने के लिए रेडियो की तुलना में अधिक एकाग्रचित्त होने की जरूरत पड़ती है। कहने का तात्पर्य है कि टेलीविजन पर प्रसारित कार्यक्रमों को देखते समय कोई अन्य कार्य करना संभव नहीं होता है। 

6. सरल तकनीकी: टेलीविजन सरल तकनीकी वाला संचार माध्यम है, जिसके चलते इसे आपरेट करने में अधिक तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती है। तभी तो छोटे बच्चों के साथ-साथ कम पढ़े-लिखे तथा अशिक्षित व्यक्ति आसानी से इसका उपयोग कर लेते हैं। 

कमजोरी

  1. टेलीविजन के माध्यम से संचारक से प्रापक की ओर सूचना का सम्प्रेषण तो सम्भव है, परन्तु प्रापक की प्रतिक्रिया को जानना संचारक के लिए संभव नहीं है।  
  2. टेलीविजन से शिक्षा ग्रहण करने के लिए अधिक ध्यान केन्द्रित करने की आवश्यकता होती है।
  3. टेलीविजन के उपयोग के लिए बिजली तथा सूचना प्रसारण जैसी सुविधाओं का होना आवश्यक है, जो इसके उपयोग को सीमित करता है।
  4. टेलीविजन का बच्चों के शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक, संवेगात्मक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
  5. टेलीविजन संचार का एक तरफा माध्यम है।


शुक्रवार

टेलीविजन की विशेषताएँ (Characteristics of television)

Dr Awadhesh K. Yadav (Assistant Professor)     अक्टूबर 10, 2025    

टेलीविजन एक प्रमुख संचार माध्यम है, जो दृश्य और श्रव्य तत्वों का संयोजन करके दर्शकों के लिए सूचना, शिक्षा और मनोरंजन से सम्बन्धित कार्यक्रमों का प्रसारण करता है। इसका आविष्कार 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में जॉन लोगी बेयर्ड ने किया। भारत में टेलीविजन का प्रसारण 1959 में प्रारंभ हुआ, जो वर्तमान समय में करोड़ों घरों में मौजूद है। टेलीविजन की विशेषताएँ इसे रेडियो, अखबार या इंटरनेट से अलग बनाती हैं। यह न केवल मनोरंजन का स्रोत है, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिवर्तनों का उत्प्रेरक भी है।


इसकी प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित हैं:- 

1. दृश्य-श्रव्य माध्यम: टेलीविजन की सबसे प्रमुख विशेषता इसका दृश्य-श्रव्य (ऑडियो-विजुअल) स्वरूप है। यह केवल ध्वनि या चित्र नहीं, बल्कि दोनों का जीवंत संयोजन प्रस्तुत करता है। दृश्य तत्व जैसे चित्र, रंग, गति और अभिनय दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ते हैं, जबकि श्रव्य तत्व संवाद, संगीत और ध्वनि प्रभाव गहराई प्रदान करते हैं। उदाहरणस्वरूप, एक समाचार प्रसारण में एंकर की आवाज के साथ घटनास्थल के वीडियो फुटेज दर्शक को घटना की सच्चाई का अहसास कराते हैं। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार दृश्य-श्रव्य माध्यम स्मृति को 65 प्रतिशत तक मजबूत करता है, जबकि केवल श्रव्य माध्यम 10 प्रतिशत ही प्रभावी होता है। भारत में दूरदर्शन के धारावाहिक जैसे ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ ने इसी विशेषता से करोड़ों दर्शकों को बांधा, जहां दृश्यों ने पौराणिक कथाओं को जीवंत कर दिया। 

2. विस्तृत पहुंच और व्यापक प्रभाव: टेलीविजन की एक और महत्वपूर्ण विशेषता इसकी विस्तृत पहुंच है। यह सैटेलाइट, केबल और डिजिटल प्रसारण के माध्यम से ग्रामीण से लेकर शहरी क्षेत्रों तक लाखों-करोड़ों दर्शकों तक पहुँचता है। भारत में दूरदर्शन के राष्ट्रीय नेटवर्क ने 1980 के दशक में पूरे देश को जोड़ा, जबकि आज एक हजार से अधिक चैनल उपलब्ध हैं। वैश्विक स्तर पर, बीबीसी या सीएनएन जैसे चैनल अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को तुरंत प्रसारित करते हैं। यह विशेषता इसे राजनीतिक अभियानों, चुनावों और आपातकालीन सूचनाओं के लिए आदर्श बनाती है। उदाहरण के लिए 2020 के कोविड-19 महामारी के दौरान टीवी ने लॉकडाउन नियमों और स्वास्थ्य जागरूकता को घर-घर पहुँचाया। हालांकि, डिजिटल विभाजन एक चुनौती है, लेकिन जीयो और एयरटेल जैसे डीटीएच सेवाओं ने इसे कम किया है। टेलीविजन की पहुंच न केवल भौगोलिक है, बल्कि सामाजिक भी यह सभी वर्गों, जातियों और भाषाओं के लोगों को एक मंच पर लाता है, जिससे सामाजिक एकीकरण बढ़ता है।

3. कार्यक्रमों की विविधता: टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों में विविधता इसे बहुमुखी बनाता है। समाचार चैनल ताजा अपडेट देते हैं, मनोरंजन चैनल धारावाहिक और रियलिटी शो प्रसारित करते हैं, जबकि खेल चैनल लाइव मैच दिखाते हैं। शैक्षिक कार्यक्रम जैसे डिशक्वरी चैनल के वृत्तचित्र या इग्नू के दूरस्थ शिक्षा प्रसारण ज्ञानवर्धक होते हैं। भारत में क्षेत्रीय भाषाओं के चैनल स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा देते हैं। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने टीवी को स्ट्रीमिंग के साथ एकीकृत कर दिया है, जहाँ दर्शक अपनी पसंद का कंटेंट चुन सकते हैं। यह विविधता दर्शकों की उम्र, रुचि और पृष्ठभूमि के अनुसार अनुकूलित होती है, लेकिन कभी-कभी सनसनीखेज सामग्री नकारात्मक प्रभाव भी डालती है। फिर भी, यह विशेषता टीवी को परिवारिक मनोरंजन का केंद्र बनाती है।

4. तात्कालिकता और लाइव प्रसारण: टेलीविजन की तात्कालिकता इसे अन्य माध्यमों से श्रेष्ठ बनाती है। लाइव प्रसारण के माध्यम से घटनाएँ वास्तविक समय में दिखाई जाती हैं, जैसे ओलंपिक खेल या संसद सत्र। 1969 के मून लैंडिंग प्रसारण ने दुनिया को एक साथ जोड़ा। भारत में 1990 के दशक में क्रिकेट विश्व कप के लाइव मैचों ने टीवी क्रांति ला दी। तकनीकी रूप से, 5जी और फाइबर ऑप्टिक्स ने लाइव स्ट्रीमिंग को बिना बफरिंग के संभव बनाया है। यह विशेषता आपदा प्रबंधन में उपयोगी है, जैसे 2004 के सुनामी या 2013 के उत्तराखंड बाढ़ में राहत सूचनाएँ। हालांकि, लाइव प्रसारण में त्रुटियाँ (जैसे गलत रिपोर्टिंग) तेजी से फैल सकती हैं, जिसके लिए फैक्ट-चेकिंग आवश्यक है।

5. मनोरंजन, शिक्षा और जागरूकता का संयोजन: टेलीविजन मनोरंजन को शिक्षा से जोड़ता है। कार्यक्रम जैसे सत्यमेव जयते ने सामाजिक मुद्दों (महिला सशक्तिकरण, बाल विवाह) पर जागरूकता फैलाई। शैक्षिक चैनल जैसे खान अकादमी की टीवी वर्जन बच्चों को सीखने में मदद करते हैं। विज्ञान कार्यक्रम पर्यावरण जागरूकता बढ़ाते हैं। भारत सरकार के ‘मन की बात’ जैसे कार्यक्रम नीतियों को जन-जन तक पहुँचाते हैं। यह विशेषता टीवी को ‘इन्फोटेनमेंट’ का माध्यम बनाती है, जहाँ मनोरंजन के बहाने शिक्षा दी जाती है।

6. विज्ञापन और आर्थिक महत्व: टेलीविजन विज्ञापन का शक्तिशाली माध्यम है। विज्ञापनदाता उत्पादों को दृश्य अपील से बेचते हैं, जैसे अमूल के हास्यपूर्ण ऐड। भारत में टीवी विज्ञापन उद्योग 2023 में 100 बिलियन रुपये का था। यह विशेषता ब्रांड बिल्डिंग में सहायक है, लेकिन ओवर-कमर्शियलाइजेशन दर्शकों को परेशान कर सकता है।

7. तकनीकी उन्नयन और स्मार्ट फीचर्स: आधुनिक टीवी में एलईडी और ओएलईडी स्क्रीन, स्मार्ट फीचर्स, वॉयस कंट्रोल और इंटरनेट इंटीग्रेशन हैं। 8K रिज़ॉल्यूशन और वीआर सपोर्ट भविष्य की दिशा हैं। भारत में स्मार्ट टीवी की बिक्री 2025 तक दोगुनी होने का अनुमान है। यह पोर्टेबिलिटी बढ़ाता है, क्योंकि कंटेंट मोबाइल पर भी उपलब्ध है।

8. सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव: टीवी संस्कृति को आकार देता है। ‘बिग बॉस’ जैसे शो वास्तविकता को प्रभावित करते हैं, जबकि समाचार चैनल राजनीतिक ध्रवीकरण बढ़ा सकते हैं। वैश्वीकरण से पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बढ़ा, लेकिन क्षेत्रीय चैनल प्रतिरोध करते हैं।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि टेलीविजन एक बहुमुखी माध्यम है, जो तकनीक, समाज और अर्थव्यवस्था को जोड़ता है। इसकी विशेषताएं इसे अपरिहार्य बनाती हैं। भविष्य में एआई और 6जी इसे और आधुनिक बनाएंगे।


गुरुवार

भारत में टेलीविजन का विकास (Development of television in India)

Dr Awadhesh K. Yadav (Assistant Professor)     अक्टूबर 09, 2025    

प्रारंभिक चरण

भारत में टेलीविजन प्रसारण की शुरुआत 15 सितंबर, 1959 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा वयस्कों को शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से आकाशवाणी के अधीन दूरदर्शन के नाम से हुई। इसकी स्थापना के लिए यूनेस्को द्वारा 20,000 डॉलर का अनुदान प्रदान किया गया था। दूरदर्शन के पहले निदेशक शैलेंद्र शंकर थे। प्रसारण के लिए आकाशवाणी भवन, नई दिल्ली की पांचवीं मंजिल पर एक छोटे स्टूडियो में 500 वाट का ट्रांसमीटर स्थापित किया गया, जिसके माध्यम से 20 किलोमीटर के दायरे में प्रसारण संभव था।

1960-61 में दिल्ली के स्कूली बच्चों के लिए टेलीविजन पर शैक्षिक कार्यक्रमों का प्रसारण शुरू हुआ। वयस्कों की शिक्षा और स्कूलों के लिए कार्यक्रमों को बढ़ावा देने हेतु सरकार ने सामुदायिक टेलीविजन सेट वितरित किए। इसी वर्ष पहली बार स्वतंत्रता दिवस के ध्वजारोहण का सीधा प्रसारण किया गया। अक्टूबर 1961 में फोर्ड फाउंडेशन और शिक्षा निदेशालय, दिल्ली के सहयोग से एक शिक्षणात्मक योजना शुरू की गई, जिसमें प्रति सप्ताह स्कूली बच्चों के लिए भौतिकी, रसायन विज्ञान, भूगोल, समाजशास्त्र, हिंदी, और अंग्रेजी जैसे विषयों पर 20-20 मिनट के पाठ सुबह-शाम प्रसारित होने लगे। प्रख्यात समाजशास्त्री पाल न्यूरथ ने इस योजना को टेलीविजन को शिक्षा का प्रभावी साधन बनाने वाला कदम बताया।

नियमित प्रसारण और विस्तार

15 अगस्त, 1965 को एक घंटे का नियमित प्रसारण शुरू हुआ, और उसी दिन पहला समाचार बुलेटिन प्रसारित किया गया। इससे पहले टेलीविजन प्रसारण मुख्य रूप से स्कूली शिक्षा और ग्रामीण विकास पर केंद्रित था। 26 जनवरी, 1967 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किसानों को कृषि संबंधी नवीन तकनीकों और संसाधनों की जानकारी देने के लिए कृषि दर्शन कार्यक्रम शुरू किया। शुरुआत में यह कार्यक्रम बुधवार और शुक्रवार को 20-20 मिनट के लिए प्रसारित होता था, जिसे 15 जुलाई, 1970 से बढ़ाकर 30 मिनट कर दिया गया।

2 अक्टूबर, 1972 को बंबई में, 26 जनवरी, 1973 को श्रीनगर, और 29 सितंबर, 1973 को अमृतसर में दूरदर्शन केंद्र स्थापित किए गए। श्रीनगर और अमृतसर केंद्रों की स्थापना सरकार ने मजबूरी में की, क्योंकि इन क्षेत्रों में लाहौर और इस्लामाबाद से प्रसारित भारत विरोधी कार्यक्रमों का प्रभाव बढ़ रहा था। अगस्त 1975 में उपग्रह की मदद से आंध्र प्रदेश, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, गुजरात, बिहार, और महाराष्ट्र के 2400 गांवों में दूरदर्शन सेवा शुरू की गई।

1975 में नए केंद्रों का विस्तार हुआरू 27 अप्रैल को जालंधर, 9 अगस्त को कोलकाता, 14 अगस्त को मद्रास, और नवंबर में लखनऊ में प्रसारण शुरू हुआ। कोलकाता और लखनऊ के केंद्र अस्थायी थे। जनवरी 1976 में इन सातों केंद्रों से समाचार, खेल, नाटक, फीचर फिल्म, गीत और विज्ञापनों का प्रसारण शुरू हुआ। अप्रैल 1976 में चंद्रा कमेटी की सिफारिश पर दूरदर्शन को आकाशवाणी से अलग कर एक स्वतंत्र इकाई बनाया गया।

रंगीन प्रसारण और तकनीकी प्रगति

15 अगस्त, 1982 को एशियाई खेलों के अवसर पर दूरदर्शन ने रंगीन प्रसारण शुरू किया, जिसने दर्शकों के अनुभव को और समृद्ध किया। 19 नवंबर, 1985 को इनटेक्सट नामक टेलीटेक्स्ट सेवा शुरू की गई, जो समाचार और अन्य जानकारी त्वरित रूप से प्रदान करती थी। 23 फरवरी, 1987 को प्रभातकालीन प्रसारण सेवा शुरू हुई, जिसने सुबह के समय दर्शकों के लिए नए कार्यक्रम उपलब्ध कराए।

1993 में मेट्रो चौनल की शुरुआत हुई, और विदेशी चैनलों का आगमन हुआ। राष्ट्रीय प्रसारण सेवा को डीडी-1, डीडी-2 और डीडी-3 में विभाजित किया गया, जबकि क्षेत्रीय भाषाओं के चैनलों को डीडी-4, डीडी-5 और डीडी-6 नाम दिया गया। 1996 में आय बढ़ाने के लिए विज्ञापन प्रसारण सेवा शुरू की गई, जिसने दूरदर्शन को वाणिज्यिक रूप से और सशक्त बनाया।

समाचार चैनल और आधुनिक युग

3 नवंबर, 2003 को दूरदर्शन ने डीडी न्यूज नामक 24X7 समाचार चैनल शुरू किया, जो समाचार बुलेटिन और समसामयिक मुद्दों पर परिचर्चा प्रसारित करता है। इसके अलावा डीडी नेशनल पर भी नियमित समाचार बुलेटिन प्रसारित होते हैं। आज टेलीविजन पर समाचार चैनलों की होड़ लगी है, जहां ब्रेकिंग न्यूज, लाइव कवरेज, और सबसे तेज जैसे नये चैनलों की लोकप्रियता को बढ़ा रहे हैं।

डिजिटल युग और वर्तमान स्थिति

2000 के दशक के मध्य में डिजिटल टेलीविजन और डायरेक्ट-टू-होम (DTH) सेवाओं ने भारत में टेलीविजन के परिदृश्य को बदल दिया। 2004 में दूरदर्शन ने डीडी डायरेक्ट प्लस (अब डीडी फ्री डिश) लॉन्च किया, जो मुफ्त DTH सेवा प्रदान करता है और ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक रूप से लोकप्रिय है। इसने लाखों घरों तक मुफ्त में टेलीविजन चैनल पहुंचाए।

2010 के दशक में इंटरनेट और ओवर-द-टॉप (OTT) प्लेटफॉर्म्स के उदय ने टेलीविजन की परंपरागत अवधारणा को चुनौती दी। नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम, और हॉटस्टार जैसे प्लेटफॉर्म्स ने दर्शकों को ऑन-डिमांड सामग्री प्रदान की। इसके बावजूद, दूरदर्शन और अन्य पारंपरिक चैनल क्षेत्रीय भाषाओं और ग्रामीण दर्शकों के लिए प्रासंगिक बने रहे।

2020 तक भारत में 2000 से अधिक टेलीविजन चैनल उपलब्ध थे, जिनमें समाचार, मनोरंजन, खेल और क्षेत्रीय भाषा चैनल शामिल हैं। 2023 में दूरदर्शन ने अपनी डिजिटल उपस्थिति को मजबूत करने के लिए DD India को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और आकर्षक बनाया, जिसका उद्देश्य वैश्विक दर्शकों तक भारतीय संस्कृति और समाचार पहुंचाना है।

भविष्य की संभावनाएं

भारत में टेलीविजन का भविष्य डिजिटल और पारंपरिक प्रसारण के संयोजन में निहित है। 5G तकनीक और स्मार्ट टीवी के बढ़ते उपयोग ने इंटरैक्टिव और हाइब्रिड सामग्री की मांग को बढ़ाया है। दूरदर्शन भी अपनी सामग्री को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध कराने के लिए कदम उठा रहा है, जैसे यूट्यूब और अन्य स्ट्रीमिंग सेवाएं। साथ ही, एआई-आधारित सामग्री अनुशंसा और वर्चुअल रियलिटी (VR) जैसे नवाचार टेलीविजन के अनुभव को और समृद्ध कर रहे हैं।

आज भारत का टेलीविजन उद्योग शिक्षा, मनोरंजन और सूचना के क्षेत्र में एक शक्तिशाली माध्यम बना हुआ है, जो विविधता और नवाचार के साथ निरंतर विकसित हो रहा है।

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भारत में टेलीविजन के विकास पर आधारित अति लघु उत्तरी प्रश्न और उत्तर

  • प्रश्न: भारत में टेलीविजन प्रसारण की शुरुआत कब हुई? उत्तर: 15 सितंबर, 1959 को।
  • प्रश्न: दूरदर्शन की स्थापना का मुख्य उद्देश्य क्या था? उत्तर: वयस्कों को शिक्षा प्रदान करना।
  • प्रश्न: दूरदर्शन के पहले निदेशक कौन थे? उत्तर: शैलेंद्र शंकर।
  • प्रश्न: भारत में टेलीविजन प्रसारण के लिए पहला ट्रांसमीटर कितनी शक्ति का था? उत्तर: 500 वाट।
  • प्रश्न: दिल्ली में स्कूली बच्चों के लिए टेलीविजन कार्यक्रम कब शुरू हुए? उत्तर: 1960-61 में।
  • प्रश्न: स्वतंत्रता दिवस के ध्वजारोहण का पहला सीधा प्रसारण कब हुआ? उत्तर: 1960 में।
  • प्रश्न: फोर्ड फाउंडेशन के सहयोग से शिक्षणात्मक योजना कब शुरू हुई? उत्तर: अक्टूबर 1961 में।
  • प्रश्न: नियमित प्रसारण और समाचार बुलेटिन की शुरुआत कब हुई? उत्तर: 15 अगस्त, 1965 को।
  • प्रश्न: कृषि दर्शन कार्यक्रम की शुरुआत किसने की? उत्तर: इंदिरा गांधी।
  • प्रश्न: बंबई में दूरदर्शन केंद्र कब खोला गया? उत्तर: 2 अक्टूबर, 1972 को।
  • प्रश्न: उपग्रह के माध्यम से दूरदर्शन सेवा कब शुरू हुई? उत्तर: अगस्त 1975 में।
  • प्रश्न: दूरदर्शन को आकाशवाणी से कब अलग किया गया? उत्तर: अप्रैल 1976 में।
  • प्रश्न: रंगीन प्रसारण की शुरुआत कब हुई? उत्तर: 15 अगस्त, 1982 को।
  • प्रश्न: इनटेक्सट सेवा कब शुरू की गई? उत्तर: 19 नवंबर, 1985 को।
  • प्रश्न: डीडी न्यूज चैनल की शुरुआत कब हुई? उत्तर: 3 नवंबर, 2003 को।
  • प्रश्न: डीडी डायरेक्ट प्लस (डीडी फ्री डिश) कब लॉन्च हुआ? उत्तर: 2004 में।
  • प्रश्न: मेट्रो चैनल की शुरुआत कब हुई? उत्तर: 1993 में।
  • प्रश्न: विज्ञापन प्रसारण सेवा कब शुरू की गई? उत्तर: 1996 में।
  • प्रश्न: प्रभातकालीन प्रसारण सेवा कब शुरू हुई? उत्तर: 23 फरवरी, 1987 को।
  • प्रश्न: 2023 में दूरदर्शन ने किस चैनल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आकर्षक बनाया? उत्तर: डीडी इंडिया।

रविवार

इंटरनेट : इतिहास और विकास (INTERNET: History and development)

Dr Awadhesh K. Yadav (Assistant Professor)     अगस्त 10, 2025    

इंटरनेट सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि एक प्लेटफार्म है। इसका पूरा नाम ‘इंटरनेशनल नेटवर्क’ है। इंटरनेट के माध्यम से अलग-अलग स्थानों पर लगे कम्प्यूटरों को आपस में जोडकर सूचना एवं जानकारी सम्प्रेषित करने की विशेष प्रणाली विकसित की गई है। यह नेटवर्को का नेटवर्क है, जिसके माध्यम से समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं व किताबों को कम्प्यूटर स्क्रीन पर न केवल प्रकाशित किया जा सकता है, बल्कि पढ़ा भी जा सकता है, जो कहीं भुगतान के बदले तो कहीं बिलकुल मुफ्त उपलब्ध हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि इंटरनेट एक ‘ग्लोबल नेटवर्क’ है, जिसमें हजारों छोटे नेटवर्क परस्पर सम्पर्क के लिए प्रोटोकॉल भाषा का प्रयोग करते हैं। प्रोटोकॉल नियमों का संकलन वह भाषा है, जिसे नेटवर्क में परस्पर विचार-विनिमय के लिए प्रयोग किया जाता है। इंटरनेट को ‘सूचना राजपथ’ व ‘अंर्तजाल’ कहा जाता हैं। 

इंटरनेट से सूचनाओं का प्रवाह विभिन्न नेटवर्को के जरिए अंतरिक्ष में स्थित एक काल्पनिक पथ से होता है, जिसे ‘साइबर स्पेस’ कहा जाता है। इस आधार पर इंटरनेट के अध्ययन को ‘साइबरनेटिक्स’ विधा के अंतर्गत् रखा गया है। ‘साइबरनेटिक्स’ अंग्रेजी भाषा का शब्द है, जो ग्रीक भाषा के ‘काइबरनैतीज’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है- कर्णधार। अर्थात् जो नाव का कर्ण नियंत्रित करें, दिशा दें। 


इतिहास और विकास  


द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ के बीच चल रहे शीतयुद्ध के परिणाम स्वरूप इंटरनेट का आविष्कार हुआ। उस समय अमेरिकी प्रतिरक्षा विभाग के वैज्ञानिक एक ऐसे कमाण्ड कंट्रोल की संरचना विकसित करना चाहते थे, जिस पर सोवियत संघ के परमाणु हमले का प्रभाव न पड़ेे। इसके लिए अमेरिकी वैज्ञानिको ने विकेंद्रित सत्ता वाला नेटवर्क बनाया, जिसमें सभी कम्प्यूटरों को बराबर का दर्जा दिया गया। इस नेटवर्क का उद्देश्य परमाणु हमले की स्थिति में अमेरिकी सूचना संसाधनों का संरक्षण करना था।

अमेरिकी प्रतिरक्षा विभाग की पहल पर 2 सितंबर, 1969 को ‘यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया’ और ‘लॉस एंजिल्स’ में मौजूद दो कम्प्यूटरों के बीच पहली बार आंकड़ों का आदान-प्रदान किया गया। इसके बाद ‘एडवांस्ड रिसर्च प्रोजेक्ट एजेंसी’ (एआरपीए) ने एक परियोजना शुरू की, जिसमें अमेरिका के चार प्रमुख विश्वविद्यालयों के रिसर्च सेंटरों को कम्प्यूटर नेटवर्क से जोड़ा गया। इस परियोजना की सफलता के बाद अमेरिका के अन्य विश्वविद्यालय भी स्वयं को नेटवर्क में शामिल करने की मांग करने लगे। सन् 1970 में एआरपीए ने अपने नेटवर्क को दो हिस्सों में विभाजित कर दिया। पहला, एमआईएल नेट और दूसरा, एआरपीए नेट। एमआईएल नेट से प्रतिरक्षा विभाग तथा एआरपीए नेट से गैर-प्रतिरक्षा विभाग के संस्थानों को जोड़ा गया। 


रे टॉम लिनसन ने पहली बार सन् 1972 में ई-मेल का प्रयोग किया और यूजर आईडी बनाने के लिए / का प्रयोग किया। सन् 1973 में ट्रांसमिशन कंट्रोल प्रोटोकाल/इंटरनेट प्रोटोकाल (टीसीपी/आईपी) को डिजाइन किया गया। इससे उपभोक्ताओं को फाइल डाउनलोड करने में मदद मिलने लगी। सन् 1983 में इंटरनेट दो कम्प्यूटरों के मध्य संचार का साधन बन गया। तब तक इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या 562 हो गयी थी। सन् 1984 में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या बढकर 1024 हो गयी। इस प्रकार, एआरपीए नेट की सफलता को देखते हुए अमेरिका के ‘नेशनल साइंस फाउंडेशन’ ने सन् 1986 में एनएसएफ नेट की शुरूआत की, जिसके माध्यम से विज्ञान से संबंधित रिसर्च सेंटरों को आपस में जोड़ा गया। यह नेटवर्क भी सफल रहा और धीरे-धीरे एआरपीए नेट का स्थान लेने में कामयाब रहा।


भारत में इंटरनेट क विकास

भारत में इंटरनेट का आगमन एजूकेशनल एण्ड रिसर्च नेटवर्क के प्रयासों से 1987-88 में हो गया था, लेकिन तब सीमित संख्या में कुछ सभ्रांत लोग ही इसका उपयोग करते थे। 15 अगस्त, 1995 को विदेश संचार निगम लिमिटेड (VNSL) ने गेटवे सर्विस के तहत पहली बार भारतीय कम्प्यूटरों को दुनिया के कम्प्यूटरों से जोड़ा। तब कहीं जाकर इंटरनेट आम लोगों को उपयोग के लिये उपलब्ध हो सका। परिणामतः राजधानी दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों के 32 हजार इंटरनेट उपभोक्ता हो गये। इसका शीघ्र ही मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, बंगलौर, पुणे, कानपुर, लखनऊ, चंडीगढ़, जयपुर, हैदराबाद, गोवा, पटना आदि शहर में विस्तार किया गया। प्रारंभ में सॉफ्टवेयर निर्यातक, सलाहकार, वैज्ञानिक, प्रशिक्षण संस्थान और व्यावसायिक संस्थान इंटरनेट उपभोक्ता थे। नवम्बर 1998 में निजी इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडरों के सम्बन्ध में दिशा-निर्देश जारी हुआ। 12 नवम्बर, 1998 को ‘सत्यम इनफो’ और ‘सी-डॉट’ के बीच लाइसेंस का समझौता हुआ। ‘सत्यम इनफो’ भारत की दूसरी ( VSNL के बाद) और निजी क्षेत्र की पहली इंटरनेट प्रदाता कम्पनी है, जो ‘सत्यम ऑनलाइन’ के नाम से देश के प्रमुख शहरों में इंटरनेट सुविधा प्रदान करती है। 1998 के अंत तक देश में करीब 7 लाख इंटरनेट उपभोक्ता थे। यह संख्या 31 दिसंबर, 2000 तक बढक़र 18 लाख हो गयी।   

भारत सरकार ने मार्च 2002 में देश के सभी जिला मुख्यालय को इंटरनेट से जोडऩे की योजना शुरू की।  इसके बाद इंटरनेट शहर की सीमा को तोडक़र गांवों में पहुंच गया। मार्च 2009 में टेलीकॉम रेङ्गयूलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) ने अपनी रिपोर्ट जारी कर बताया कि इंटरनेट के क्षेत्र में देश में 5.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी है। तब देश में कुल इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या एक करोड़ से अधिक बतायी गयी थी। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मार्च 2009 तक देश में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या 120.85 लाख थी और वृद्धि दर 5.3 प्रतिशत थी।  एक रिपोर्ट के मुताबिक 2025 तक देश में कुल इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या 90 करोड हो जायेगी। 

कन्वर्जेन (Convergence)

Dr Awadhesh K. Yadav (Assistant Professor)     अगस्त 10, 2025    

सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कन्वर्जेंस एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें विभिन्न प्रकार की तकनीकों, प्रणालियों और सेवाओं का एकीकरण होता है। इसके परिणाम स्वरूप उनके बीच की पारंपरिक सीमाएँ धुंधली हो जाती हैं। यह डिजिटल युग की एक महत्वपूर्ण विशेषता है, जो तकनीकी नवाचारों, नेटवर्किंग और डेटा प्रबंधन की प्रगति के साथ तेजी से विकसित हो रही है। कन्वर्जेंस ने न केवल तकनीकी के क्षेत्र को बल्कि सामाजिक, आर्थिक और व्यावसायिक परिदृश्य को भी गहराई से प्रभावित किया है। 

अंग्रेजी भाषा के Convergence का शाब्दिक अर्थ ‘अभिसरण’, ‘मिलन’ या ‘एक साथ आना’ होता है। सूचना प्रौद्योगिकी के संदर्भ में यह विभिन्न तकनीकों, उपकरणों और सेवाओं के एकीकरण को संदर्भित करता है, जिससे सभी एक सामान्य मंच पर कार्य कर सकें। टेलीफोन, टेलीविजन और कंप्यूटर अलग-अलग उपकरण हैं। सभी अलग-अलग कार्यो के लिए उपयोग किए जाते थे, लेकिन कन्वर्जेंस ने सभी को एक ही डिवाइस या प्लेटफॉर्म पर एकीकृत कर दिया है।

इस प्रकार, कन्वर्जेंस तकनीकी का उपकरण होने के कारण स्मार्टफोन केवल कॉल करने के लिए उपयोग  नहीं किया जाता है, बल्कि इससे इंटरनेट ब्राउजिंग, वीडियो स्ट्रीमिंग, गेमिंग और यहाँ तक कि कार्यालयी कार्यों के लिए भी उपयोग किया जाता है। कन्वर्जेंस का यह प्रभाव न केवल व्यक्तिगत उपयोगकर्ताओं के लिए बल्कि व्यवसायों, उद्योगों और समाज के लिए भी क्रांतिकारी रहा है। यह तकनीकी सीमाओं को तोड़ता है और नवाचार के नए द्वार खोलता है।

कन्वर्जेंस के प्रकार

सूचना प्रौद्योगिकी में कन्वर्जेंस को निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है, जो विभिन्न क्षेत्रों में तकनीकी एकीकरण को दर्शाते हैं।

  1.  टेक्नोलॉजी कन्वर्जेंस: टेक्नोलॉजी कन्वर्जेंस तब होता है जब विभिन्न प्रकार के उपकरण और तकनीकें एक ही डिवाइस या प्लेटफॉर्म में एकीकृत हो जाती हैं। उदाहरण- स्मार्टफोन एक ऐसा उपकरण है जो टेलीफोन, कैमरा, म्यूजिक प्लेयर और कंप्यूटर के कार्यों को एक साथ करता है। पहले, ये सभी कार्य अलग-अलग उपकरणों द्वारा किए जाते थे। यह उपयोगकर्ताओं के लिए सुविधाजनक है, क्योंकि एक ही डिवाइस से कई कार्य किए जा सकते हैं। साथ ही, यह उपकरणों की लागत और जटिलता को कम करता है। टेक्नोलॉजी कन्वर्जेंस को संभव बनाने में हार्डवेयर की प्रगति (जैसे अधिक शक्तिशाली प्रोसेसर) और सॉफ्टवेयर की लचीलापन (जैसे मल्टीटास्किंग ऑपरेटिंग सिस्टम) ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  2. नेटवर्क कन्वर्जेंस: नेटवर्क कन्वर्जेंस में विभिन्न प्रकार के नेटवर्क जैसे टेलीफोन नेटवर्क, इंटरनेट और केबल टीवी नेटवर्क, सभी एक ही नेटवर्क इन्फ्रास्ट्रक्चर पर कार्य करते हैं। जैसे- VoIP (Voice over Internet Protocol) तकनीक, जो इंटरनेट के माध्यम से वॉयस कॉल को संभव बनाती है। यह नेटवर्क कनवर्जेंस का प्रमुख उदाहरण है। इसके अलावा IPTV (Internet Protocol Television½ ने पारंपरिक केबल टीवी को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ला दिया है। इस प्रकार, नेटवर्क कन्वर्जेंस ने डेटा, वॉयस और वीडियो को एक ही IP आधारित नेटवर्क पर एकीकृत किया है, जिससे लागत कम हुई है और सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। उच्च गति के ब्रॉडबैंड नेटवर्क, जैसे 5G और फाइबर ऑप्टिक्स ने नेटवर्क कन्वर्जेंस को बढ़ावा दिया है।
  3. इंडस्ट्री कन्वर्जेंस: इंडस्ट्री कन्वर्जेंस तब होता है जब IT का उपयोग विभिन्न उद्योगों में किया जाता है, जिससे उनके बीच की सीमाएँ धुंधली हो जाती हैं। स्वास्थ्य सेवा में टेलीमेडिसिन का उपयोग, जहाँ मरीज और डॉक्टर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जुड़ते हैं। शिक्षा में ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म्स ने पारंपरिक कक्षा शिक्षण को डिजिटल रूप दिया है। इंडस्ट्री कन्वर्जेंस के कारण उद्योगों के बीच सहयोग बढ़ता है और नए बिजनेस मॉडल्स का विकास होता है। उदाहरण- मनोरंजन और गेमिंग उद्योग, जो क्लाउड गेमिंग और स्ट्रीमिंग सेवाओं के साथ एकीकृत हो रहे हैं। AI, IoT और बिग डेटा एनालिटिक्स ने इंडस्ट्री कन्वर्जेंस को संभव बनाया है।
  4. डेटा और एप्लिकेशन कन्वर्जेंस: डेटा और एप्लिकेशन कन्वर्जेंस में विभिन्न डेटा स्रोतों और सॉफ्टवेयर एप्लिकेशनों का एकीकरण होता है। क्लाउड कंप्यूटिंग प्लेटफॉर्म्स जैसे । AWS या Google Cloud डेटा स्टोरेज, AI और IoT सेवाओं को एक ही मंच पर प्रदान करते हैं। यह व्यवसायों को तेजी से निर्णय लेने, डेटा प्रबंधन को सरल बनाने और स्केलेबल समाधानों को लागू करने में सक्षम बनाता है। बिग डेटा, मशीन लर्निंग APIs ने डेटा और एप्लिकेशन कन्वर्जेंस को गति दी है।

कन्वर्जेंस के लाभ और चुनौतियां

कन्वर्जेंस ने IT और उससे संबंधित अन्य क्षेत्रों में निम्नलिखित लाभ प्रदान किए हैं।

  1. दक्षता में बढ़ोत्तरी: एकीकृत प्रणालियाँ और उपकरण अपने उपयोगकर्ताओं के समय और संसाधनों की बचत करते हैं। उदाहरण के लिए एक स्मार्टफोन से कई कार्य करने की क्षमता उपयोगकर्ताओं के लिए समय बचाती है और व्यवसायों के लिए परिचालन लागत कम करती है।
  2. नवाचार: कन्वर्जेंस ने नए उत्पादों और सेवाओं के विकास को बढ़ावा दिया है। उदाहरण के लिए स्मार्ट होम डिवाइसेज (जैसे  Amazon Echo) ने IoT और AI को एकीकृत करके घरेलू स्वचालन को संभव बनाया है।
  3. बेहतर उपयोगकर्ता अनुभव: कन्वर्जेंस से उपयोगकर्ताओं को एक सहज और एकीकृत अनुभव मिलता है। उदाहरण के लिए एक ही ऐप से वीडियो कॉल, मैसेजिंग और फाइल शेयरिंग करना संभव हो गया है।
  4. लागत में कमी: नेटवर्क और उपकरणों का एकीकरण लागत को कम करता है। उदाहरण के लिए  कॉल्स पारंपरिक टेलीफोन कॉल्स की तुलना में सस्ते होते हैं।
  5. स्केलेबिलिटी: क्लाउड-आधारित समाधान और एकीकृत नेटवर्क व्यवसायों को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार सेवाओं को स्केल करने की सुविधा प्रदान करते हैं।

उपरोक्त लाभों को प्रदान करने के बावजूद कन्वर्जेंस को निम्नलिखित चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।  

  1. सुरक्षा जोखिम: एकीकृत प्रणालियों में साइबर हमलों का जोखिम बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए एक स्मार्ट डिवाइस हैक होने पर उपयोगकर्ता की गोपनीय जानकारी खतरे में पड़ सकती है।
  2. जटिलता: विभिन्न तकनीकों और प्रणालियों का एकीकरण जटिल हो सकता है। उदाहरण के लिए विभिन्न डिवाइसों और सॉफ्टवेयर के बीच अंतर संचालनीयता सुनिश्चित करना मुश्किल हो सकता है।
  3. नियामक चुनौतियाँ: कन्वर्जेंस ने डेटा गोपनीयता और नियामक अनुपालन से संबंधित नई चुनौतियाँ पैदा की हैं। उदाहरण के लिए GDPR जैसे नियम डेटा प्रबंधन के लिए सख्त दिशा-निर्देश लागू करते हैं।
  4. तकनीकी निर्भरता: एकीकृत प्रणालियों पर अत्यधिक निर्भरता तकनीकी विफलताओं के जोखिम को बढ़ा सकती है। उदाहरण के लिए यदि एक क्लाउड सर्वर डाउन हो जाता है, तो कई सेवाएँ प्रभावित हो सकती हैं।

निष्कर्ष

सूचना प्रौद्योगिकी में कन्वर्जेंस ने तकनीकी, व्यावसायिक, और सामाजिक परिदृश्य को गहराई से प्रभावित किया है। यह विभिन्न तकनीकों, नेटवर्कों और उद्योगों के बीच की सीमाओं को धुंधला करके अधिक एकीकृत और कुशल समाधान प्रदान करता है। हालांकि, इसके साथ आने वाली चुनौतियाँ, जैसे सुरक्षा और जटिलता, को संबोधित करना भी आवश्यक है। भविष्य में, नई तकनीकों के साथ कन्वर्जेंस और अधिक गति पकड़ेगा, जो नवाचार और उपयोगकर्ता अनुभव को और बेहतर बनाएगा।


सोमवार

रेडियो के मजबूत और कमजोर पक्ष (Strengths and Weaknesses of Radio)

Dr Awadhesh K. Yadav (Assistant Professor)     अगस्त 04, 2025    

रेडियो एक ऐसा माध्यम है, जो 20वीं सदी की शुरुआत से ही सूचना, शिक्षा और मनोरंजन का प्रमुख स्रोत रहा है। इसकी सादगी, व्यापक पहुँच और कम लागत ने इसे विश्व भर में लोकप्रिय बनाया है। विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ अन्य आधुनिक संचार माध्यमों की पहुँच सीमित है। भारत जैसे देश में जहाँ विविधता भरी आबादी और भौगोलिक चुनौतियाँ हैं, रेडियो ने सामाजिक और सांस्कृतिक एकीकरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। लेकिन, डिजिटल युग में इंटरनेट, टीवी, और स्मार्टफोन के बढ़ते प्रभाव के कारण रेडियो को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। फिर भी, रेडियो के मजबूत एवं कमजोर पक्ष निम्नलिखित हैं:-

  • मजबूत पक्ष  (Strengths)

  1. विस्तृत पहुँच: रेडियो की सबसे बड़ी ताकत इसकी व्यापक पहुँच है। यह उन क्षेत्रों में भी प्रभावी है जहाँ इंटरनेट, टेलीविजन या बिजली की सुविधा सीमित है। ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में जहाँ स्मार्टफोन या ब्रॉडबैंड कनेक्शन उपलब्ध नहीं हैं, रेडियो... समाचार, मनोरंजन और जानकारी का एकमात्र स्रोत हो सकता है। उदाहरण के लिए भारत में आकाशवाणी और सामुदायिक रेडियो स्टेशन ग्रामीण समुदायों तक स्थानीय भाषाओं में जानकारी पहुँचाते हैं। रेडियो कम लागत वाले उपकरणों (जैसे ट्रांजिस्टर रेडियो) के माध्यम से हर वर्ग, आयु और शिक्षा स्तर के लोगों तक पहुँचता है। यह उन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो पढ़-लिख नहीं सकते, क्योंकि यह केवल श्रवण पर आधारित है। भारत के दूरदराज के गाँवों में, जहाँ साक्षरता दर कम है, वहां रेडियो के माध्यम से स्वास्थ्य, कृषि और सरकारी योजनाओं की जानकारी दी जाती है।
  2. कम लागत और सुलभता: रेडियो प्रसारण और रिसीविंग डिवाइस दोनों ही अन्य संचार माध्यमों की तुलना में बहुत किफायती हैं। एक साधारण रेडियो सेट की कीमत स्मार्टफोन या टीवी की तुलना में बहुत कम होती है, और इसे बैटरी या सौर ऊर्जा से भी चलाया जा सकता है। प्रसारण की लागत भी अपेक्षाकृत कम है, जिसके कारण छोटे समुदाय भी अपने रेडियो स्टेशन शुरू कर सकते हैं। रेडियो सेट्स की कम कीमत और रखरखाव की आसानी इसे गरीब और मध्यम वर्ग के लिए सुलभ बनाती है। साथ ही, रेडियो प्रसारण के लिए बड़े पैमाने पर बुनियादी ढाँचे की आवश्यकता नहीं होती, जैसा कि इंटरनेट या टीवी के लिए होता है। 
  3. आपातकालीन संचार में विश्वसनीय: आपदा या संकट की स्थिति में जब बिजली, इंटरनेट या मोबाइल नेटवर्क बाधित हो जाते हैं, रेडियो का उपयोग विश्वसनीय संचार साधन के रूप में किया जाता है। यह त्वरित और प्रभावी ढंग से महत्वपूर्ण जानकारी (जैसे- मौसम की चेतावनी, राहत कार्यों की सूचना या सरकारी निर्देश) लोगों तक पहुँचाता है। रेडियो की बैटरी-आधारित प्रकृति और सिग्नल की व्यापक रेंज इसे प्राकृतिक आपदाओं (जैसे- बाढ़ व भूकंप) के दौरान उपयोगी बनाती है। 2004 के हिंद महासागर सुनामी या 2013 के उत्तराखंड बाढ़ के दौरान रेडियो ने लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचने और राहत कार्यों की जानकारी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  4. स्थानीय और सांस्कृतिक प्रासंगिकता: रेडियो स्थानीय भाषाओं, संस्कृति, और समुदायों की जरूरतों के अनुरूप सामग्री प्रदान करता है। सामुदायिक रेडियो स्टेशन विशेष रूप से स्थानीय मुद्दों (जैसे- कृषि तकनीक, स्वास्थ्य जागरूकता, और शिक्षा) पर ध्यान केंद्रित होते हैं। यह स्थानीय कलाकारों, संगीत और परंपराओं को बढ़ावा देने में भी मदद करता है। रेडियो स्थानीय समुदायों को उनकी भाषा और सांस्कृतिक संदर्भ में जानकारी और मनोरंजन प्रदान करता है, जिससे यह समावेशी और प्रासंगिक बनता है। हिमाचल प्रदेश में सामुदायिक रेडियो स्टेशन, जैसे ‘रेडियो नग्गर’ स्थानीय समुदायों के लिए उनकी भाषा में कार्यक्रम प्रसारित करता है।
  5. मोबिलिटी और लचीलापन: रेडियो की पोर्टेबल प्रकृति इसे एक अत्यंत लचीला माध्यम बनाती है। इसे घर, खेत, गाड़ी या यात्रा के दौरान कहीं भी सुना जा सकता है। छोटे और हल्के रेडियो सेट्स इसे आसानी से ले जाने योग्य बनाते हैं। रेडियो का उपयोग बिना किसी जटिल सेटअप के किया जा सकता है, और यह उन लोगों के लिए भी सुलभ है जो निरंतर गतिशील रहते हैं, जैसे किसान या मजदूर। ट्रक चालक लंबी यात्राओं के दौरान रेडियो पर समाचार और संगीत सुनते हैं, जो उन्हें सूचित और मनोरंजित रखता है।
  6. मनोरंजन और शिक्षा का स्रोत: रेडियो मनोरंजन (संगीत, नाटक, कहानियाँ) और शिक्षा (स्वास्थ्य जागरूकता, कृषि सलाह, सरकारी योजनाएँ) दोनों प्रदान करता है। यह विशेष रूप से उन क्षेत्रों में प्रभावी है जहाँ शिक्षा का स्तर कम है। रेडियो के शैक्षिक कार्यक्रम लोगों को नई जानकारी और कौशल सिखाने में मदद करते हैं, जबकि मनोरंजन कार्यक्रम तनाव कम करने और सामाजिक जुड़ाव बढ़ाने में सहायक हैं। आकाशवाणी के ‘कृषि जगत’ जैसे कार्यक्रम किसानों को मौसम, फसल प्रबंधन और नई कृषि तकनीकों की जानकारी देते हैं।
  7. वास्तविक समय की जानकारी: रेडियो तत्काल समाचार, खेल स्कोर, यातायात अपडेट और मौसम की जानकारी प्रदान करने में सक्षम है। यह इसे एक गतिशील और समयबद्ध माध्यम बनाता है। रेडियो की त्वरित प्रसारण क्षमता इसे समाचार और अपडेट के लिए एक विश्वसनीय स्रोत बनाती है। क्रिकेट मैचों के दौरान लाइव कमेंट्री या यातायात की स्थिति पर अपडेट रेडियो के माध्यम से तुरंत उपलब्ध होते हैं।

  • कमजोर पक्ष (Weaknesses)

  1. केवल श्रव्य माध्यम: इसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि रेडियो केवल श्रव्य माध्यम पर है। इसमें दृश्य तत्व (विजुअल्स) की कमी के कारण जटिल जानकारी (जैसे- ग्राफिक्स, चार्ट या वीडियो) को समझाना मुश्किल होता है। दृश्य सामग्री के बिना कुछ विषयों (वैज्ञानिक अवधारणाएँ या जटिल डेटा विश्लेषण) को समझाना कठिन होता है। एक नक्शे या ग्राफ को केवल शब्दों में वर्णन करना टीवी या इंटरनेट की तुलना में कम प्रभावी होता है।
  2. सीमित इंटरैक्टिविटी: रेडियो एकतरफा संचार माध्यम है, जिसमें श्रोताओं की तत्काल प्रतिक्रिया या भागीदारी की गुंजाइश सीमित होती है। हालांकि कुछ रेडियो स्टेशन फोन-इन प्रोग्राम या एसएमएस के माध्यम से इंटरैक्शन की सुविधा देते हैं, जो इंटरनेट या सोशल मीडिया की तुलना में बहुत कम है। श्रोताओं के पास अपनी राय व्यक्त करने या सवाल पूछने का सीमित अवसर होता है।
  3. आधुनिक माध्यमों से प्रतिस्पर्धा: इंटरनेट, टीवी और स्मार्टफोन के बढ़ते उपयोग ने रेडियो की लोकप्रियता (खासकर शहरी क्षेत्रों में) को प्रभावित किया है। युवा पीढ़ी यूट्यूब, पॉडकास्ट और लाइव स्ट्रीमिंग सेवाओं की ओर अधिक आकर्षित हो रही है। हालांकि, पॉडकास्ट की ऑन-डिमांड सेवा रेडियो के निर्धारित समय के प्रसारण से अधिक सुविधाजनक हो सकती है।
  4. सीमित कार्यक्रम प्रसारित: रेडियो पर सीमित कार्यक्रमों का प्रसारण होता है। कई रेडियो स्टेशनों पर प्रसारित कार्यक्रमों का दोहराव होता है। एक ही गाने को कई बार बजाया जाता है। सीमित विषयों पर बार-बार चर्चा की जाती है, जो श्रोताओं के मन में ऊबन पैदा करते हैं। प्रसारण सामग्री की कमी या दोहराव के कारण श्रोता अन्य माध्यमों की ओर आकर्षित होते हैं। 
  5. सिग्नल और तकनीकी समस्याएँ: रेडियो सिग्नल की गुणवत्ता... मौसम, भौगोलिक स्थिति या तकनीकी बाधाओं पर निर्भर करती है। पहाड़ी क्षेत्रों, घने जंगलों या दूरदराज के इलाकों में सिग्नल कमजोर हो सकता है। सिग्नल की खराब गुणवत्ता या रेंज की कमी रेडियो की प्रभावशीलता को कम हो जाती है।
  6. विज्ञापन पर निर्भरता: कई वाणिज्यिक रेडियो स्टेशन अपनी आय के लिए विज्ञापनों पर निर्भर होते हैं, जिसके कारण कार्यक्रमों के बीच बार-बार विज्ञापन प्रसारित करते हैं। यह श्रोताओं के लिए कष्टप्रद होता है। अत्यधिक विज्ञापन का प्रसारण रेडियो पर प्रसारित कार्यक्रमों की गुणवत्ता को प्रभावित करता है और श्रोताओं के अनुभव को भी खराब करता है।
  7. पुरानी तकनीक और सीमित नवाचार: डिजिटल युग में रेडियो की पारंपरिक तकनीक (AM/FM) को कुछ हद तक पुराना माना जाने लगा है। हालांकि, डिजिटल रेडियो और इंटरनेट रेडियो ने इस कमी को कुछ हद तक दूर किया है, लेकिन ये सुविधाएँ अभी भी सभी क्षेत्रों में उपलब्ध नहीं हैं। आधुनिक तकनीकों की तुलना में रेडियो की तकनीकी सीमाएँ इसे कम आकर्षक बनाती हैं।

निष्कर्ष

रेडियो एक सुलभ, किफायती और विश्वसनीय संचार माध्यम है, जो विशेष रूप से ग्रामीण और कम संसाधन वाले क्षेत्रों में प्रभावी है। इसकी व्यापक पहुँच, कम लागत और आपातकालीन संचार में विश्वसनीयता इसे आज भी प्रासंगिक बनाती है। हालांकि, इसकी ऑडियो-आधारित प्रकृति, सीमित इंटरैक्टिविटी और डिजिटल माध्यमों से बढ़ती प्रतिस्पर्धा इसे कुछ मामलों में कम प्रभावी बनाती है।

आधुनिक युग में रेडियो की प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए नवाचार आवश्यक है। डिजिटल रेडियो, इंटरनेट स्ट्रीमिंग और सामुदायिक रेडियो जैसे कदम इस दिशा में सकारात्मक हैं। यदि रेडियो बदलते समय के साथ तालमेल बिठा सके, तो यह भविष्य में भी सूचना और मनोरंजन का एक महत्वपूर्ण स्रोत बना रहेगा।


रविवार

न्यू मीडिया की विशेषताएं (Characteristics of New Media)

Dr Awadhesh K. Yadav (Assistant Professor)     अगस्त 03, 2025    

 न्यू मीडिया एक अद्भूत संचार माध्यम है, जिसका अनुसरण व अनुकरण दुनिया भर के लोग कर रहे हैं। वास्तविक दृष्टि से न्यू मीडिया समाज का ’वास्तविक आईना’ है, क्योंकि इसके प्रचलन से पूर्व व्यवसायिक संचार माध्यमों- समाचार पत्र, रेडियो व टेलीविजन के दफ्तरों में कार्यरत चंद लोग ही तय करते थे कि किस समाचार को कब और कैसे सम्प्रेषित करना हैं, जिसमें पाठकों, श्रोताओं व दर्शकों की कोई सहभागिता नहीं थी, किन्तु वर्तमान में ऐसी स्थिति नहीं है। न्यू मीडिया ने व्यवसायिक संचार माध्यमों को बेपर्दा करने तथा वास्तविकता से पर्दा हटाने का कार्य किया जा रहा है, जो न्यू मीडिया की निम्नलिखित विशेषताओं के कारण संभव हो रहा है:- 

  1. Integrated (एकीकृतद्ध) : न्यू मीडिया की पहली विशेषता Integrated है, क्योंकि इंटरनेट आधारित होने के कारण सभी संचार माध्यम (प्रिण्ट माध्यम- समाचार पत्र, पत्रिका व पुस्तक, इलेक्ट्रानिक माध्यम- रेडियो, टेपरिकॉर्डर व टेलीविजन तथा अन्य माध्यम- टेलीफोन, मोबाइल, फैक्स, पेजर, टेलीप्रिन्टर व टेलीग्राफ इत्यादि) आपस में एकीकृत हो गये हैं। उदाहरण- कम्प्यूटर, एण्ड्रायड व विण्डोज फोन आदि, जिनका मल्टी-उपयोग हो रहा है। 
  2. Digital (डिजिटल): यह न्यू मीडिया की दूसरी विशेषता है। इससे उपभोक्ताओं को गुणवत्तायुक्त संगीत सुनने, मनपसंद टैक्स्ट तलाशने तथा उसे संशोधित करने की सहुलियत मिलने लगी है। शाब्दिक दृष्टि से Digital शब्द का निर्माण अंग्रेजी भाषा के Digit (अंक) से हुआ है। कहने का तात्पर्य यह है कि न्यू मीडिया की सम्पूर्ण सामग्री डिजिट में होती है। उदाहरण- इंटरनेट रेडियो बजाने सुई घुमाकर स्टेशन सर्च करने की जरूरत नहीं पड़ती है, बल्कि निर्धारित डिजिट वाले स्टेशन कोड लिखकर सर्च करते ही प्रसारित कार्यक्रम सुनाई देने लगता है। 
  3. Interactive (सहभागी): न्यू मीडिया की तीसरी प्रमुख विशेषता Interactive है। Interactive से तात्पर्य द्वि-चरणीय संचार प्रक्रिया से है। न्यू मीडिया पर प्रसारित सामग्री टैक्स्ट आधारित हो या ऑडिया-वीडिया के रूप में। सभी के अंदर अपने पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों को तत्काल अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सहभागी बनने की सुविधा होती है। उदाहरण- फेसबुक, ब्लॉग, वेब पोर्टल्स इत्यादि, जो अपने उपभोक्ताओं को फीडबैक व्यक्त करने की सुविधा देते हैं। 
  4. Hypertextual (हाइपरटैक्टुअल): यह न्यू मीडिया की प्रमुख विशेषता है। Hypertextual की सुविधा केवल न्यू मीडिया पर ही उपलब्ध होती है, जिसकें अंतर्गत छोटे से संकेत के अंदर बड़ी से बड़ी जानकारी छुपी होती है। उदाहरण- वेब पोर्टर्ल्स के टैक्स्ट होता है कि- भारतीय संविधान के लेखक डा. भीमराव अम्बेदकर है। इसमें भारतीय संविधान और डा. भीमराव अम्बेदकर दोनों Hypertextual हो सकते हैं, जिन्हें क्लिक करते ही क्रमशः भारतीय संविधान और डा. भीमराव अम्बेदर से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी स्क्रिन पर प्रदर्शित होने लगती है।
  5. Virtual (वर्जुअल):  न्यू मीडिया की पांचवी विशेषता Virtual है, क्योंकि इसके माध्यम से किसी भी सूचना, जानकारी या संदेश को ऐसे सम्प्रेषित किया जाता है, जो वर्जअल होता है किन्तु पाठक, श्रोता व दर्शक को वास्तविक जानकारी देता है। उदाहरण-  ट्रेन दुर्घटना या प्लेन क्रैश होने की जानकारी को एनिमेशन के साथ सम्प्रेषित किया जाता है, जिसमें दुर्घटना स्थल की वास्तविक फोटोग्राफ या विजुअल नहीं होते हैं, बल्कि कॉल्पनिक फोटोग्राफ व विजुअल की सहायता से जानकारी देने का प्रयास किया जाता है।
  6. Network (नेटवर्क): न्यू मीडिया की छठी विशेषता नेटवर्क का है, जिसके अंतर्गत व्यक्ति व विभिन्न संगठनों के सदस्य आपस में जुड़े होते हैं तथा सभी के मित्रता, आर्थिक लेनदेन, समान विचारधारा, समान अभिरूचि इत्यादि का सम्बन्ध होता है। न्यू मीडिया के नेटवर्क से जुड़े लोग एक-दूसरे के साथ जानकारी, अनुभव, विचार इत्यादि न केवल साझा करते हैं, बल्कि पक्ष व विपक्ष में विचार-विमर्श भी करते हैं। यह सुविधा न्यू मीडिया के अतिरिक्त किसी अन्य माध्यम पर उपलब्ध नहीं है। यदि उपलब्ध भी है तो उसमें काफी समय लगता है तथा काफी खर्चीला है।
  7. Simulated (सीमुलेटेड): यह न्यू मीडिया की सातवीं प्रमुख विशेषता है, जिसके अंतर्गत उपभोक्ताओं को अपनी कल्पना को आकार देने तथा दूसरों से साझा करने की सुविधा मिलती है।


शुक्रवार

न्यू मीडिया की अवधारणा (Concepts of New Media)

Dr Awadhesh K. Yadav (Assistant Professor)     जुलाई 25, 2025    

 सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) की मौजूदा शताब्दी में न्यू मीडिया की सहायता से विचारों, भावनाओं, जानकारियों व अनुभूतियों का बगैर सेंसरशिप के अत्यंत तीब्र गति से सम्प्रेषण हो रहा है। इसकी सर्वप्रथम परिकल्पना 19वीं शताब्दी में ’लोकतंत्रिक सहभागी मीडिया सिद्धांत’ के प्रतिपादक जर्मनी के मैकवेल ने की थी। हालांकि, उस वक्त दुनिया में इंटरनेट का आविष्कार नहीं हुआ था, लेकिन जर्मनी में लोकतंत्र का शुभारंभ जरूर हो चुका था। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में लोक प्रसारण अर्थात सर्वाजनिक प्रसारण के अंतर्गत समाज के आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक समेत विभिन्न क्षेत्रों में उच्च स्तरीय सुधार की अपेक्षा की गई थी, जिसे सार्वजनिक प्रसारण संगठनों ने पूरा नहीं किया। इसका मुख्य कारण मीडिया पर औद्योगिक घरानों का नियंत्रण, औद्योगिक घरानों का शासन-प्रशासन के साथ निकट सम्बन्ध, आर्थिक व सामाजिक दबाव तथा अभिजातपूर्ण व्यवहार था। ऐसी स्थिति में मैकवेल ने जनता की आवाज को सामने लाने के लिए वैकल्पिक मीडिया अर्थात न्यू मीडिया की परिकल्पना की। 


 19वीं शताब्दी के मध्य में न्यू मीडिया के रूप में अवतरित टेलीविजन ने संचार विशेषज्ञों को आश्चर्य चकित कर दिया। टोरंटो स्थित ’मीडिया स्टडीज सेंटर’ के संस्थापक मार्शल मैकलुहान ने 20वीं शताब्दी के मध्य में ’समाज पर टेलीविजन का प्रभाव’ विषयक अध्ययन किया तथा सन् 1964 में ’अंडरस्टैडिंग मीडिया: द एक्सटेंशन ऑफ मैन’ शीर्षक से पुस्तक प्रकाशित की। इनका मानना है कि संदेशों के प्रचार-प्रसार के लिए माध्यमों का विकास व विस्तार होना बेहद जरूरी है, क्योंकि संचार माध्यमों के विकास व विस्तार के साथ संदेश का प्रचार व प्रसार भी होगा। इसी आधार पर उन्होंने कहा कि ’माध्यम ही संदेश है’ (Medium is the Message)  है। 

मार्शल मैकलुहान ने टेलीविजन को प्रचार-प्रसार का उन्मादी माध्यम बताया है। इन्होंने रेडियो को ‘ट्रइबल ड्रम‘ (Tribal Dram)] फोटो को दीवार रहित वैश्यालय (Brothel-without Walls) तथा टेलीविजन को यांत्रिक दुल्हन (Mechanical Bride) की संज्ञा दी है तथा वैश्विक गांव (Global Village) की परिकल्पना की है। जिसको तत्कालीक संचार विशेषज्ञों ने 'गप' कहकर मजाक उड़ाया। न्यू मीडिया के रूप में अवतरित टेलीविजन वर्तमान शताब्दी में लाभ-हानि के सिद्धांत पर औद्योगिक घरानों द्वारा संचालित किया जा रहा है, जिसमें कार्यरत संपादक, समाचार वाचक, स्क्रीप्ट लेखक, संवाददाता, कैमरामैन व तकनीकी सहायक अपने नियोक्ता के इशारों पर गेट-कीपर का कार्य कर रहे हैं। शासन-प्रशासन को संचालित करने वाले राजनीतिज्ञ तथा सरकारी संगठनों में तैनात वरिष्ठ अधिकारी अपने-अपने तरीके से औद्योगिक घरानों को नियंत्रित करते हैं। विज्ञापनदाता भी अपने हित के लिए टेलीविजन चैनलों की विषय वस्तु को प्रभावित करते हैं। परिणामतः टेलीविजन चैनलों की विषय वस्तु आम जनों पर केंद्रीत नहीं होती है। यदि होती भी है तो उसमें प्रभावशाली व्यक्तियों का हित छुपा होता है। अतः टेलीविजन चैनल मैकवेल के न्यू मीडिया की परिकल्पना पर खरा नहीं उतरा है। 

शीत युद्धोंपरांत अवतरित इंटरनेट आधारित न्यू मीडिया किसी चमत्कार से कम नहीं है, क्योंकि वर्तमान शताब्दी में इसका उपयोग कर किसी सूचना या जानकारी को पलक झपकते ही दुनिया के किसी भी कोने में सम्प्रेषित किया जा सकता है। ताजातरीन समाचारों व जानकारियों को प्राप्त करने के लिए समाचार पत्र प्रकाशित होने का इंतजार करने की आवश्यकता भी नहीं है, जो न्यू मीडिया के कारण संभव हुआ है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि ...आखिर न्यू मीडिया किसे कहते हैं तथा 21वीं शताब्दी में क्यों प्रासंगिक है? 

न्यू मीडिया : अधिकांश लोग न्यू मीडिया का अर्थ इंटरनेट आधारित पत्रकारिता से लगाते हैं, लेकिन न्यू मीडिया समाचारों, लेखों, सृजनात्क लेखन या पत्रकारिता तक सीमित नहीं है। वास्तव में न्यू मीडिया को परम्परागत मीडिया के आधार पर परिभाषित ही नहीं किया जा सकता है, क्योंकि इसके दायरे में मात्र समाचार पत्रों व टेलीविजन चैनलों की वेबसाइट्स मात्र नहीं आती हैं, बल्कि नौकरी ढूढ़ने व रिश्ता तलाशने वाली वेबसाइट्स, विभिन्न उत्पादों की ऑनलाइन बिक्री करने वाले वेब पोर्टल्स, स्कूलों, कालेजों व विश्वविद्यालयों में प्रवेश, पाठ्य-सामग्री, परीक्षा-परिणाम से सम्बन्धित जानकारी देने वाली वेबसाइट्स, ब्लॉग्स, ई-मेल, ई-नीलामी, ई-पुस्तक, ई-कॉमर्स, ई-बैंकिंग, चैटिंग, ऑडियो-वीडियो शेयरिंग, यू-ट्यूब तथा सोशल नेटवर्किंग साइट्स (फेसबुक, ऑरकूट, ट्वीटर, लिक्ड-इन इत्यादि) से सम्बन्धित वेबसाइट्स व साफ्टवेयर भी न्यू मीडिया के अंतर्गत आते हैं।

शाब्दिक दृष्टि से न्यू मीडिया अंग्रेजी भाषा के दो शब्दों New और Media के योग से बना है। New शब्द का अर्थ ’नया’ अर्थात ’नवीन’ तथा Media शब्द का अर्थ ’माध्यम’ होता है। इस दृष्टि से न्यू मीडिया अपने समय का सर्वाधिक नवीन माध्यम है। न्यू मीडिया का वर्तमान काल में जैसा स्वरूप है, वह न तो अतीत (भूत) काल में था और न तो भविष्यकाल में रहेगा, क्योंकि प्रारंभ में जब टेलीविजन आया था, तब उसे भी न्यू मीडिया कहा गया था। संचार व मीडिया विशेषज्ञों ने न्यू मीडिया को अपने-अपने तरीके से परिभाषित करने का प्रयास किया है। कुछ प्रमुख परिभाषाएं निम्नलिखित हैं:- 

  • लेव मैनोविच के अनुसार- न्यू मीडिया डिजिटल तकनीकों पर आधारित है, जो मॉड्यूलर डेटा, स्वचालन, और परिवर्तनशीलता (Variability) की विशेषताओं के साथ सूचना का उत्पादन और प्रसार करता है।
  • मैनुएल कास्टेल्स के अनुसार- न्यू मीडिया एक नेटवर्क समाज का हिस्सा है, जो विकेंद्रित संचार और सूचना के वैश्विक प्रवाह को सक्षम बनाता है।
  • हेनरी जेनकिन्स के अनुसार- न्यू मीडिया ‘कन्वर्जेन्स कल्चर’ को दर्शाता है, जहां विभिन्न मीडिया रूप (टेक्स्ट, ऑडियो, वीडियो) एक मंच पर एकीकृत होकर इंटरैक्टिव अनुभव प्रदान करते हैं।
  • क्ले शिर्की के अनुसार- न्यू मीडिया उपयोगकर्ता-जनित सामग्री और सामाजिक उत्पादन को बढ़ावा देता है, जिससे व्यक्तियों को सामग्री निर्माण और साझाकरण में सक्रिय भूमिका मिलती है।

उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर संक्षेप में कहा जा सकता है कि न्यू मीडिया से तात्पर्य उन डिजिटल और इंटरनेट आधारित संचार माध्यमों से है, जो परंपरागत मीडिया (जैसे प्रिंट, रेडियो, टेलीविजन) से भिन्न हैं। यह इंटरैक्टिव, उपयोगकर्ता-केंद्रित, और प्रौद्योगिकी-संचालित होता है, जो सूचना के उत्पादन, वितरण और उपभोग को नया रूप देता है


मंगलवार

विज्ञापन प्रक्रिया (Process of advertising)

Dr Awadhesh K. Yadav (Assistant Professor)     जुलाई 15, 2025    

 भारत में विज्ञापन व्यवसाय का विकास स्वतंत्रता के बाद हुआ है। यह एक सृजनात्मक व्यवसाय है, जिसको अन्तिम लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए समय के साथ आरंभ और अन्त करना पड़ता है। एक व्यवसाय के रूप में विज्ञापन को संचालित करने में विज्ञापन एजेंसी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। विज्ञापन एजेंसी, विज्ञापन व्यवसाय में दक्ष व्यक्तियों का संगठन है जो विज्ञापन का निर्माण, वितरण, विज्ञापन अभियान का संचालन और मूल्यांकन करता है। इसकी प्रक्रिया को विज्ञापन प्रक्रिया कहते हैं, जिसे निम्र प्रकार से समझा जा सकता है:-


  1. उद्देश्य का चयनः विज्ञापन प्रक्रिया का पहला चरण उद्देश्य का चयन है, जो ब्राण्ड के विक्रय, पुनर्बिक्री में बढ़ोत्तरी, बाजार में उत्पाद की हिस्सेदारी में बढ़ोत्तरी, सूचना प्रदान करने, पुनः स्मरण कराने, ध्यान आकर्षित करने,  प्रेरित करने तथा साख का निर्माण करने इत्यादि से सम्बन्धित हो सकता है।
  2. संदेश का निर्धारण: उद्देश्य निर्धारण के बाद विज्ञापन प्रक्रिया के दूसरे चरण में संदेश का निर्धारण किया जाता है, जो संदेश विज्ञापन की विषय वस्तु को स्पष्ट करता है। संदेश में विज्ञापित वस्तु का निर्धारण करते समय विशेष रूप से यह ध्यान में रखा जाता है कि उसमें लक्षित जनता या उपभोक्ता को प्रभावी तरीके से अपनी ओर आकृष्ट करने की क्षमता हो। इस कार्य में उपभोक्ताओं की आवश्यकता व उनका व्यवहार मददगार होते हैं।
  3. लक्षित जनता या उपभोक्ता की पहचानः विज्ञापन प्रक्रिया के तीसरे चरण में लक्षित जनता या उपभोक्ता की पहचान की जाती है, जिसके बीच विज्ञापन के माध्यम से संदेश सम्प्रेषित होना है। लक्षित जनता की पहचान विज्ञापन को लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए आवश्यक होता है। साथ ही माध्यम के चयन के लिए भी लक्षित जनता या उपभोक्ता की पहचान सहायक होती है।
  4. माध्यम का चुनाव: उपर्युक्त माध्यम का चुनाव विज्ञापन प्रक्रिया का चौथा चरण है। वर्तमान समाज में जन-माध्यामों की विविधता है। लक्षित जनता या उपभोक्ता तक पहंचने के लिए उपर्युक्त माध्यम का होना आवश्यक है। माध्यम का चुनाव करते समय लक्षित जनता या उपभोक्ता की स्थिति, उनके बीच माध्यम की पहुंच इत्यादि को ध्यान में रखा जाता है।
  5. संदेश का प्रसार: यह विज्ञापन प्रक्रिया का अंतिम चरण है। संदेश को लक्षित जनता और संभावित बाजार में उचित माध्यम की सहायता से प्रसारित किया जाता है। सघन रूप से प्रसारित संदेश की पहुंच अधिकांशतः लक्षित जनता तक होती है।


विज्ञापनः अर्थ एवं परिभाषा (Advertising : Meaning and Definition)

Dr Awadhesh K. Yadav (Assistant Professor)     जुलाई 08, 2025    

वर्तमान समय में प्रत्येक व्यक्ति अपने बढते कदमों के साथ ऊँचाईयों को छूने में लगा है। इस क्रम में तेज दौड़ने और सबसे आगे निकलने के लिए प्रत्येक व्यक्ति व संस्था विज्ञापन का सहारा लेता है, क्योंकि वर्तमान प्रतिस्पर्धा के युग में विज्ञापन ही एक ऐसा साधन है जिसो प्रयोग कर अधिक से अधिक लोगों के साथ सम्पर्क स्थापित किया जा सकता है। ऐसे में मौजूदा समय को ‘विज्ञापन युग’ कहा जाए तो गलत नहीं होगा, क्योंकि आज का मानव विज्ञापन से घिरा हुआ है। नजर उठाकर जिधर देखिए उधर विज्ञापन ही नजर आता है। विज्ञापन जहां उपभोक्ताओं को उनकी आवश्यकता के हिसाब से नई-नई जानकारी देते हैं, वहीं विज्ञापनदाताओं को उनके उत्पाद, विचार या सेवा के प्रति अच्छी छवि का निर्माण कर आर्थिक लाभ भी पहुंचाते हैं। अतः कहा जा सकता है कि विज्ञापन दूसरों की जेब से पैसा निकालने का साधन है।

विज्ञापन का अर्थ 

सामान्यतः विज्ञापन किसी उत्पाद, विचार व सेवा के बारे में उपभोक्ता को जानकारी उपलब्ध करवाने की योजना है, जिससे उपभोक्ताओं को अपनी आवश्यकता व बजट के अनुसार उत्पाद का चयन करने में मदद मिलती है तथा उसके मन में उस उत्पाद को खरीदने की इच्छा उत्पन्न होती है। इस प्रकार, विज्ञापन मानव जीवन में सहायक की भूमिका का निर्वाहन करता है। विज्ञापन का सर्वप्रथम उद्देश्य लक्षित उपभोक्ताओं को आर्कषक ढंग से किसी वस्तु या सेवा का सन्देश देना है।

विज्ञापन दो शब्दों ‘वि’ और ‘ज्ञापन’ के योग से बना है। ‘वि’ का अर्थ- ‘विशेष’ तथा ‘ज्ञापन’ का अर्थ ‘जानकारी या सूचना देना’ होता है। इस प्रकार, विज्ञापन शब्द का अर्थ ‘विशेष सूचना या जानकारी देना’ हुआ। विज्ञापन को अंग्रेजी में Advertising कहते हैं। । Advertising शब्द लैटिन भाषा के Advertor से बना है, जिसका अर्थ है- टू टर्न टू यानी किसी तरफ मोड़ना। फारसी भाषा में विज्ञापन को ‘जंग-ए-जरदारी’ कहा जाता है। बृहद हिन्दी शब्दकोष के अनुसार- विज्ञापन का अर्थ समझना, सूचना देना, इश्तहार, निवेदन व प्रार्थना है।

वर्तमान में विज्ञापन न केवल सूचना व संचार का एक सशक्त माध्यम बनकर सामने आया है, जिससे मानव की समस्त गतिविधियां प्रभावित हुई हैं। इसके प्रभाव को जनमानस की गहराईयों तक देखा जा सकता है। विपणन के क्षेत्र में विज्ञापन एक शक्तिशाली औजार के रूप में काम करता है। किसी विक्रेता के लिए अपने ग्राहकों से अपनी बात कहने, समझाने और मनाने का सबसे सहज साधन है- विज्ञापन। इसका प्रकाशन या प्रसारण निःशुल्क नहीं होता है। इसके लिए एक विज्ञापनदाता या प्रायोजक की जरूरत होती है, जो विज्ञापन प्रकाशित या प्रसारित करने के बदले में संचार माध्यमों को शुल्क का भुगतान करता है। विज्ञापन को भारतीय तथा पाश्चात्य विद्वानों ने निम्न प्रकार परिभाषित किया है।

भारतीय विद्वान के अनुसार

  • डा. नगेन्द्र के अनुसार- ‘‘विज्ञापन का अर्थ है पर्चा, परिपत्र, पोस्टर अथवा पत्र-पत्रिकाओं द्वारा सार्वजनिक घोषणा।"
  • डा. अर्जुन तिवारी के अनुसार- ‘‘विज्ञापन लाभ-हानि का प्रभावी माध्यम है तथा सामाजिक परिवर्तन का एक सशक्त उपकरण है।"
  • के. पी. नारायण के अनुसार- ‘‘विज्ञापन का प्रत्यक्ष सम्बन्ध प्रचार-प्रसार से है।"
  • के. के. सक्सेना के अनुसार- “विज्ञापन का तात्पर्य एक ऐसी पद्धति से है जिसके द्वारा कुछ निश्चित वस्तुओं व सेवा के अस्तित्व तथा विशेषताओं की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया जाता है।"

पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार

  • इग्लैण्ड के प्रधानमंत्री मलेडस्टोन के अनुसार- “व्यवसाय के लिए विज्ञापन का वही महत्व है जो उद्योग के लिए वाष्पशक्ति का।"
  • अमेरिकन मार्केटिंग एसोशिएसन के अनुसार- ‘‘विज्ञापन एक जाने पहचाने प्रस्तुतकर्ता द्वारा अपना व्यय करके की गई र्निव्यक्तिक प्रस्तुति है एवं विचारों, सेवाओं एवं वस्तुओं का संवर्धन है।"
  • विख्यात विज्ञापन विशेषज्ञ शैल्डन के अनुसार- ‘‘विज्ञापन वह व्यावसायिक शक्ति है जिससे मुद्रित शब्दों द्वारा विक्रय करने, उसकी ख्याति व साख निर्माण में सहायता मिलती है।
  • एम्बर्ट के अनुसार- “विज्ञापन एक ऐसी विद्या है जिसमें विपणन पारम्परिक ढंग से हटकर किया जाता है।"

अतः विज्ञापन एक ऐसा साधन है जिसके लिए समुचित व्यय करके अपने विचार, वस्तु या सेवा के प्रति जनाकर्षण उत्पन्न कर उसके प्रति जिज्ञासा और ललक लगाई जाती है तथा अपने विचार, वस्तु या सेवा की क्रय शक्ति का विस्तार किया जाता है। विज्ञापन के उदाहरण की बात करे तो अनेकों विज्ञापन आंखों के सामने नजर आने लगते हैं। विज्ञापन वस्तु की इच्छा जाग्रत होने पर मनुष्य के मन में बड़ी तेजी से धूमने लगते है। विज्ञापन ही मनुष्य की उस जाग्रत इच्छा कों शान्त करने में सहायक बनते है। विज्ञापन उपभोक्ता के साथ-साथ उत्पादक के लिए भी बाजार में मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है।


वेब 3.0 (Web 3.0)

Dr Awadhesh K. Yadav (Assistant Professor)     नवंबर 05, 2024    

 सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तार की अनंत संभावनाओं को देखते हुए बड़े ही आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि आने वाली पीढ़ी का मीडिया अभूतपूर्व होगा। वेब की दो पीढ़ी विकसित हो चुकी है- वेब 1.0 और वेब 2.0। वर्तमान समय में वेब 3.0 की कल्पना की जा रही है। एक अनुमान के मुताबिक वेब 3.0 इतनी आधुनिक होगी कि इसके सामने आज की तकनीक और इंटरनेट स्पीड कुछ भी नहीं होगी।

अपने दौर का सर्वाधिक लोकप्रिय अमेरिकी टीवी धारावाहिक ‘स्टार ट्रेक’ में भविष्य की न्यू मीडिया के नजारों को देखा जा चुका है। क्या आने वाला मीडिया ‘स्टार ट्रेक’ जैसी गल्प और कल्पनाओं को साकार कर देगा। इसका जवाब फौरन हां में भले ही न दिया जा सके, लेकिन इसे बिल्कुल न कहकर नकारा भी नहीं जा सकता है। 

संभवतः इन्हीं कारणों से वर्ल्ड वाइड वेब के जन्मदाता टिम बर्नर्स ली ने सिमैंटिक वेब की कल्पना की होगी। इस शब्दावली के जन्मदाता भी टिम बर्नर्स ली ही हैं। उन्होंने इसे वेब 3.0 का एक महत्त्वपूर्ण घटक माना है। टिम बर्नर्स ली का कहना है कि सिमैंटिक वेब ही आगामी न्यूनता की ओर ले जाएगा। अतः वेब 3.0 को समझने से पहले सिमंटिक वेब को जानना जरूरी है।

सिमैटिक का सामान्य अर्थ शब्दार्थ विज्ञान है। यह एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें अर्थ का निष्पादन किया जाता है। इसे समझने की प्रक्रिया को सिमेंटिक कहा जाता है। वेब के संदर्भ में सिमेंटिक का अर्थ है वर्ल्ड वाइड वेव का ऐसा विस्तार है, जहां लोग एप्लीकेशंनों और वेबसाइटों की परिधियों से आगे जाकर कंटेंट को शेयर कर सकते हैं। इसे काल्पनिक विजन माना जाता है। सिमैंटिक वेब को डाटा का वेब (वेब ऑफ डाटा) भी कहा जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वेब गतिविधि को नया बदलाव देगा। आज कई सिमैंटिक तकनीकें बनाई जा रही हैं, कई एप्लीकेशनों की खोज की जा रही है, ताकि वेब को और सहज, सुगम और सरल बनाया जा सके। ऐसा भी कहा जा सकता है कि सिमैंटिक वेब, कंप्यूटर को मनुष्य मस्तिष्क के समतुल्य करने की एक शुरुआत है।

टिम बर्नर्स ली, जेम्स हैंडलर और ओरा लासिला ने मई 2001 में मशहूर विज्ञान पत्रिका साइंटिफिक अमेरिकन में सिमैंटिक वेब के बारे में सबसे पहले अपना शोध प्रकाशित किया था। टिम और अन्य के मुताबिक, ‘‘सिमैंटिक वेब, मौजूदा वेब का एक विस्तार है जिसमें सूचना को एक सटीक परिभाषित अर्थ दिया गया है, जिसमें कंप्यूटर ज्यादा कारगर है और जहां लोग सहयोग के साथ काम कर सकते हैं।‘‘

टिम बर्नर्स ली ने सिमैंटिक वेब को परिभाषित करते हुए कहा कि यह एक डाटा वेब है जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मशीनों द्वारा परिवर्तित और परिष्कृत किया जा सकता है। उनके मुताबिक यह वेब एक साथ संदर्भ और सामग्री (कॉन्टेक्स्ट एंड कंटेंट) को पढ़ने और समझने की क्षमता वाला होगा।

यह सामग्रियों को फिल्टर कर सकेगा और यूजर के समक्ष सिर्फ वही सामग्री पेश करेगा जो सबसे प्रासंगिक हो, सबसे प्रासंगिक सोर्स से आई हों और सबसे ताजा हो। इस काम के लिए यूजर को अपनी सामग्री के संदर्भ वाली सूचना मुहैया करानी होगी, जिसका कि एक तरीका टैगिंग है।

कुल मिलाकर विचार ये है कि वेब, यूजर के इनपुट और कंटेंट के चरित्र-चित्रण का इस्तेमाल करेगा जो आगे चलकर नतीजतन सिमैंटिक और अर्थ आधारित गुणात्मक सर्च को संभव बनाएगा। इसके लिए एक नए प्रोटोकॉल, आरडीएफ रिसोर्स डिस्क्रिप्शन फ्रेमवर्क पर वर्ल्ड वाइल्ड वेब कंजेटियम डब्ल्यूसी काम कर रहा है। इसी प्रोटोकाल के जरिए वेब की हर तरह की सूचना या डाटा को कोड किया जाएगा। इसमें एक समान भाषा विकसित की जाएगी जो गुणात्मक सर्च को संभव कर सकेगी। 


लाइट (Light)

Dr Awadhesh K. Yadav (Assistant Professor)     नवंबर 05, 2024    

मानव जीवन में लाइट का विशेष महत्व है। इसके बगैर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। मानव की आंख तभी देख पाती हैं, जब लाइट परिवर्तित होकर उस पर पहुंचता है। विभिन्न रंगों के रूप में लाइट किसी भी वस्तु से टकराकर आंख की पुतली से होकर रेटिना तक पहुंचती है। फिर रेटिना से बनने वाली तस्वीर संदेश के रूप में हमारे मस्तिष्क में उतर जाती हैं। इसी तकनीक पर फोटोग्राफी के दौरान कैमरा भी काम करता है। मानव की आंख और कैमरा की तुलना करने पर पता चलता है कि किसी दृश्य को देखने हेतु कैमरा की तुलना में मानव की आंख अधिक सक्षम होती है। रंगों की बारिकीया पकड़ना हो या रात के समय कम प्रकाश में देखना हो, कैमरे की तुलना में मानव की आंख कई गुना अधिक कारगर होती है। इसलिए एक बात हमेशा याद रखनी होती है कि लाइटिंग कैमरे के लिए की जाती है, मानव के आंख के लिए नहीं।


सामान्यतः हम अपने जीवन में लाइटिंग से परिचत होते हैं। हम अपने-अपने घरों में लाइट का उपयोग करते हैं, लेकिन लाइटिंग के सौंदर्य बोध की तरफ हमारा ध्यान कम ही जाता है। हम अपने शयनकक्ष में नाइट लैम्प लगाते हैं, लेकिन इसके उद्देश्य पर गंभीरता से नहीं सोचते हैं। रेस्टोरेंट में लाइट की मात्रा कम क्यों होती है? इस पर भी हमारा ध्यान नहीं जाता है। दीवाली के पर्व पर हम अपने घरों में लाइटिंग के जरिये खुशियों का प्रदर्शन करते है।

फोटोग्राफी में लाइटिंग के तीन उद्देश्य होते हैं। पहला-विषय वस्तु को प्रकाशवान करना, क्योंकि जब तक विषय वस्तु पर समुचित प्रकाश नहीं होगा, तब तक कैमरे में उसकी अच्छी फोटोग्राफी नहीं की जा सकती है। लाइटिंग के माध्यम से फोटोग्राफ में यह बताने का प्रयास किया जाता है कि कौन सा समय चल रहा है। फोटोग्राफ को बारीकी से देखने पर पता चलता है कि लाइट की मात्रा, रंग और दिशा बदलती रहती है। जैसे- सुबह और शाम के समय लाइट का रंग हल्का नारंगी होता है। इस दौरान छाया भी लम्बी बनती है। तीसरा- लाइट के मदद से फोटोग्राफ में विशेष प्रकार का भाव स्थापित किया जाता है। उपरोक्त आधार पर कहा जा सकता है कि लाइट एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके द्वारा विभिन्न लाइट स्रोतों को नियंत्रित करके किसी खास उद्देश्य के लिए इसका उपयोग किया जाता है।

इस प्रकार फोटोग्राफी में लाइट का विशेष महत्व है, क्योंकि जो विषय वस्तु हमें दिखाई देते हैं, जिसके पीछे लाइट ही होता है। लाइट के अभाव में फोटोग्राफी की कल्पना नहीं की जा सकती है। विषय वस्तु पर पड़ने वाला प्रकाश ही परावर्तित होकर लैंस के रास्ते से कैमरे में कैद हो जाता है। लाइट की सही व्यवस्था न होने पर कैमरा विषय वस्तु को ठीक प्रकार से नहीं देख पाता है और दृश्य की गुणवत्ता में गिरावट आती है। इसके साथ ही लाइट शॉट की कम्पोजिशन में एक महत्वपूर्ण तत्व होता है। लाइट के माध्यम से यह निर्धारित किया जा सकता है कि दृश्य में उपलब्ध विभिन्न तत्वों को कितना स्पष्ट या अस्पष्ट रिकोर्ड करना है। फोटोग्राफी में लाइट का प्रयोग करने का मुख्य कारण विषय वस्तु को प्रकाशमान करना होता है। कई बार विषय वस्तु को कलात्मक तरीके से दिखाने के लिए भी लाइट का प्रयोग किया जाता है। लाइट से ही निर्धारित होता है कि फोटोग्राफ में विषय वस्तु कैसे दिखाई देंगे। फोटोग्राफी में प्रयोग होने वाली लाइट निम्न प्रकार की होती है:-

डायरेक्ट और इनडायरेक्ट लाइट  (Direct and Indirect Light)

फोटोग्राफी के दौरान लाइट की समझ इस बात पर निर्भर करती है कि लाइट का स्रोत क्या है? लाइट दो मुख्य की होती है। पहला- डायरेक्ट लाइट, और दूसरा- इनडायरेक्ट लाइट। विषय वस्तु पर सीधे पड़ने वाली लाइट को डायरेक्ट लाइट कहते हैं। यह इतनी तेज होती है कि उसके विपरीत दिशा में विषय वस्तु का प्रतिबिम्ब बन जाता है। लाइट जितनी तेज होती है, प्रतिबिम्ब भी उसी अनुपात में गहरा होता है। लाइट का मुख्य स्रोत सूर्य है। यदि सूर्य की किरणें सीधे विषय वस्तु पर पड़ती हैं तो उसे डायरेक्ट लाइट कहते हैं। इसके अलावा हाईलोजन से भी विषय वस्तु पर सीधी लाइट डाली जाती है तो उसे भी डायरेक्ट लाइट कहते हैं। ऐसी लाइट में विषय वस्तु की सपाट छवि बनती है, जिसमें बहुत कम गहराई होती है। कई बार गहराई का पता ही नहीं चलता है। नाटकीय छवि बनाने के लिए भी डायरेक्ट लाइट का प्रयोग किया जाता है। 

इसके विपरीत जब विषय वस्तु पर लाइट सीधा नहीं पड़ती है तो उसे इनडायरेक्ट लाइट कहा जाता है। फोटोग्राफी के लिए इनडायरेक्ट लाइट को अच्छा माना जाता है, क्योंकि इसमें विषय वस्तु का प्रतिबिम्ब नहीं बनता है। स्टूडियो में फोटोग्राफी के दौरान डायरेक्ट लाइट को विभिन्न उपकरणों की मदद से इनडायरेक्ट लाइट में परिवर्तीत किया जाता है।

हार्ड और साफ्ट लाइट  (Direct and Indirect Light)

फोटोग्राफी में प्रयोग होने वाली लाइटों को दो प्रकार से वर्गीकृत किया जाता है। एक वह लाइट जो किसी एक दिशा में प्रकाश डालती है तथा दूसरा वह लाइट जो चारों तरफ होती है यानी जिसकी कोई दिशा नहीं होती है। जो लाइट किसी एक दिशा में प्रकाश डालती है, उसकी रोशनी काफी तेज होती है, जिसके चलते विषय वस्तु की छाया गहरी बनती है। इस प्रकार की लाइट को हार्ड लाइट कहा जाता है। इसके विपरित जिस लाइट की कोई दिशा नहीं होती और चारों तरफ फैली होती हैं और उसमें विषय वस्तु की छाया कम बनाती है। ऐसी लाइट को सॉफ्ट लाइट कहा जाता है। इन लाइटों को कई और नामों से भी जाना जाता है। जैसे- हार्ड लाइट को डायरेक्शनल लाइट कहा जाता है, क्योंकि इस लाइट की एक दिशा होती है और यह उस दिशा के विषय वस्तु को प्रकाशमान करती है। इसी प्रकार, सॉफ्ट लाइट को डिफ्यूज्ड लाइट कहा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि इनकी कोई एक दिशा नहीं होती है और यह अपने आस-पास के सभी विषयों को एक समान प्रकाशमान करती है।

हार्ड लाइट को फोकस लाइट भी कहा जाता है, क्योंकि यह किसी विषय विशेष को फोकस करके प्रयोग की जाती है। किसी विषय को प्रकाश देने के उद्देश्य से इस लाइट का प्रयोग किया जाता है। सॉफ्ट लाइट को फ्लड लाइट भी कहा जाता है, क्योंकि यह किसी विषय को ध्यान में रखकर प्रयोग नहीं की जाती है, बल्कि पूरे क्षेत्र को एक समान प्रकाशमान करती है। दैनिक जीवन में प्रयोग की जाने वाली लाइट का विश्लेषण किया जाए तो सामान्य तौर पर कमरों व गलियों में प्रयोग की जाने वाली लाइट फ्लड लाइट होती है। टॉर्च या गाड़ियों में प्रयोग होने वाली लाइट फोकस लाइट होती है। इस प्रकार वीडियो कार्यक्रमों में प्रयोग की जाने वाली लाइट अपनी प्रकृति के अनुसार या तो हार्ड लाइट होती है या फिर सॉफ्ट लाइट।

हालांकि फोटोग्राफी के लिए प्रयोग होने वाली कई लाइट ऐसी भी होती हैं, जिन्हें फ्लड लाइट के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है और फोकस लाइट के रूप में भी। इन लाइटों में यह सुविधा होती है कि उन्हें पूरे क्षेत्र को प्रकाशमान करने के लिए प्रयोग किया जा सकता है तथा आवश्यकता पड़ने पर किसी विषय विशेष पर केन्द्रित करके भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

थ्री-प्वाइंट लाइटिंग (Three-Point Lighting)

यह फोटोग्राफी के दौरान सर्वाधिक उपयोग होने वाली लाइटिंग सेट-अप है, जिसमें विषय वस्तु पर तीन तरफ से लाइट डाला जाता है। इसीलिए इसे थ्री-प्वाइंट लाइटिंग या त्रिकोण लाइटिंग कहा जाता है। थ्री-प्वाइंट लाइटिंग में विषय वस्तु को हाईलाइट करने के लिए की-लाइट का उपयोग किया जाता है। इससे उत्पन्न छाया को समाप्त करने के लिए फिल लाइट जलाई जाती है। इसके बाद, विषय वस्तु को बैकग्राउण्ट से अलग करने के लिए बैक लाइट का प्रयोग किया जाता है। इन लाइटों को त्रिकोण में उपयोग किया जाता है। विषय वस्तु के सामने क्रमशः की-लाइट और फिल लाइट का उपयोग किया जाता है, जबकि पीछे से बैकग्राउण्ट लाइट का इस्तेमाल किया जाता है। इस लाइटिंग सेट-अप से विषय वस्तु स्पष्ट रूप से उभरा हुआ दिखाई देता है। ज्यादातर फोटोग्राफी में इसी लाइटिंग तकनीकी का उपयोग किया जाता है। व्यवसायिक फोटोग्राफी में भी थ्री प्वाइंट लाइटिंग को महत्व दिया जाता है। थ्री प्वाइंट लाइटिंग को समझने के लिए क्रमशः की-लाइट, फिल लाइट और बैकग्राउण्ट लाइट को जानना जरूरी है।

  • की-लाइट: यह लाइट व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण लाइट होती है। इस लाइट से ही विषय वस्तु को प्रकाशमान किया जाता है। फोटोग्राफी के दौरान कैमरे में कैद किये जाने वाले दृश्य पर इसी लाइट से प्रकाश डाला जाता है। कहने का तात्पर्य है कि फोटोग्राफी के लिए प्रकाश की व्यवस्था की-लाइट से की जाती है। ज्यादातर हार्ड लाइट को ही की-लाइट के रूप में प्रयोग किया जाता है। इस लाइट की तीव्रता काफी तेज होती है, जिसके चलते विषय वस्तु की परछाई उत्पन्न होती है। सामान्यतः इसे विषय वस्तु के सामने 45 डिग्री पर लगाया जाता है।
  • फिल लाइट: इस लाइट को की-लाइट से उत्पन्न होने वाली परछाई को समाप्त करने के लिए प्रयोग किया जाता है। फिल लाइट को की-लाइट के समानांतर कैमरे के दूसरी ओर लगाया जाता है। अर्थात यह लाइट का उपयोग विषय वस्तु की परछाई के विपरीत दिशा में किया जाता है, जिससे विषय वस्तु की छाया समाप्त हो जाती है। फिल लाइट के लिए ज्यादातर साफ्ट लाइट का प्रयोग किया जाता है। जब की-लाइट को विषय वस्तु पर डाला जाता है, तब उसके विपरीत दिशा में अंधेरा छा जाता है। इसे तकनीकी भाषा में फालऑफ कहते हैं। जितनी अधिक क्षमता की की-लाइट का उपयोग किया जाता है, उतना ही फालऑफ अधिक बनता है। इसे समाप्त करने के लिए फिल लाइट का उपयोग किया जाता है।
  • बैकग्राउण्ड लाइट: इस लाइट को विषय वस्तु के पीछे का दृश्य दिखाने के लिए किया जाता है। जिस विषय वस्तु के पीछे सेट लगा होता है, फोटोग्राफी के दौरान सेट को दिखाने के लिए बैकग्राउण्ड लाइट का इस्तेमाल किया जाता है। इसे बैक लाइट के विपरीत दिशा से सेट पर डाला जाता है। इस लाइट को उसी दृश्यों में प्रयोग किया जाता है जिसमें बैकग्राउण्ड दिखाना होता है। 

सोमवार

वेब 2.0 प्रौद्योगिकी: अर्थ एवं एप्लीकेशन्स (Web 2.0 technologies: Meaning and applications)

Dr Awadhesh K. Yadav (Assistant Professor)     नवंबर 04, 2024    

 21वीं सदी का दूसरा दशक इंटरनेट के बेतहाशा वृद्धि का दशक है। इंटरनेट का भारत समेत दुनिया के अधिकांश देशों में बोलबाला है। परिणामतः इंटरनेट के उपभोक्ताओं की संख्या में निरंतर बढ़ोत्तरी होती जा रही है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि इंटरनेट इस तरह से शक्तिशाली जनसंचार माध्यम बनता चला गया। हाई स्पीड ब्रॉडबैंड कनेक्शन और वाईफाई हॉट स्पॉट्स ने इंटरनेट को और अधिक मोबाइल व गतिशील बना दिया है। वेब के इस इंटरैक्टिव संसार को ‘वेब 2.0 प्रौद्योगिकी’ के नाम से जाना जाता है, जहां यूजर सूचनाएं न केवल अपलोड व डाउनलोड, बल्कि शेयर भी कर रहे हैं। 

वेब 2.0 शब्द सामान्यतः ऐसे वेब प्रोग्रामों/एप्लीकेशन्स के लिए प्रयुक्त होता है, जो पारस्पारिक क्रियात्मक जानकारी बांटने, सूचनाओं के आदान प्रदान करने, उपयोगकर्ता को ध्यान में रख कर डिजाइन बनाने और वर्ल्ड वाइड वेब से जोड़ने की सुविधा प्रदान करते हैं। वेब 2.0 के उदाहरणों में वेब आधारित कम्यूनिटी/समुदाय, होस्ट सर्विस, वेब प्रोग्राम, सोशल नेटवर्किंग साइट, वीडियो शेयरिंग साइट, विकी, ब्लॉग, तथा मैशप (दो या अधिक स्त्रोतों से जानकारी एकत्रित करके बनाया गया वेब पेज) व फोक्सोनोमी (टैगिंग) शामिल हैं। एक वेब 2.0 साइट अपने उपयोगकर्ताओं को अन्य उपयोगकर्ताओं के साथ वेबसाइट की सामग्री देखने या बदलने की अनुमति देती है, जबकि नॉन-इंटरएक्टिव वेब साइटों के द्वारा उपयोगकर्ता किसी जानकारी को केवल उतना ही देख सकते हैं, जितनी जानकारी उन्हें देखने के लिए उपलब्ध कराई जाती है।

यह शब्द 2004 में ओ रेली मीडिया वेब 2.0 सम्मेलन के कारण टिम ओ रेली से जुड़ा हुआ है। हालांकि इस शब्द से वर्ल्ड वाइड वेब के नए संस्करण का पता चलता है, यह किसी तकनीकी विशेषताओं को अपडेट करने का उल्लेख नहीं करता, अपितु एक एंड यूजर/उपयोगकर्ता और सॉफ्टवेयर डेवलपर द्वारा वेब को प्रयोग करने के तरीकों में आये बदलावों को परिलक्षित करता है। 

वर्तमान समय में कई बड़ी मीडिया कंपनियां इंटरनेट व्यवसाय में उतर आई। कई लोकप्रिय वेब ठिकानों का अधिग्रहण नामी कंपनियों द्वारा किया जा रहा है। 2005 में ‘न्यूज कॉरपोरेशन’ ने ‘माईस्पेस’ का अधिग्रहण किया। इसी प्रकार, 2006 में ‘गूगल’ ने ‘यूट्यूब’ को खरीदा। 

तेजी से विकसित होते इंटरनेट ने वेब 2.0 का रास्ता बनाया है। इंटरनेट के इस विकास का सारथी बना है ब्रॉडबैंड। ब्रॉडबैंड से आशय उस विधि और प्रणाली या उस तरीके से है जिसके जरिए हम ऐसे इंटरनेट से जुड़ते हैं जिसमें सूचनाएं त्वरित गति से अपलोड व डाउनलोड की जा सकती है। जैसे- पहले डायलअप मोडेम के जरिए इंटरनेट खुलता था, अब अत्यंत तीव्र स्पीड बाले बॉडबैंड कनेक्शन आ गए हैं, जिन्हें हम 3जी (थर्ड जनेरेशन) व 4जी के नाम से जानते हैं। कई कम्पनियां कुछ बड़े देशों में 5जी शुरू करने की तैयारी में हैं। तेज इंटरनेट कनेक्शन यानी शक्तिशाली ब्रॉडबैंड के जरिए बड़ी से बड़ी फाइलें चुटकियों में इंटरनेट पर भेजी जा सकती हैं। डायलअप मोडेम में कभी एक संगीत की या फिल्म की फाइल खोलने में घंटों लग जाते थे, कनेक्शन एरर आ जाता था, लेकिन अब ब्रॉडबैंड ने उसकी गति में असाधारण तेजी ला दी है। घंटों का काम अब मिनटों या सेकेण्डों में होने लगा है।

ब्रॉडबैंड के लिए उपभोक्ताओं को अपने फोन के जरिए सैटेलाइट मोडेम, एक केबल मोडेम या डिजिटल सब्स्क्राइबर लाइन (डीएसएल) की दरकार होती है। डेस्कटॉप के साथ अब तो इंटरनेट कनेक्शन जोड़ने के लिए फोन की बाध्यता भी नहीं रह गई है। मीडिया कंपनियां कंप्यूटर के सीपीयू के साथ लगे यूएसबी सॉकेट में फिट होने लायक डूंगल निकाल चुकी हैं।

ब्रॉडबैंड की दुनिया में बेतार अर्थात वायरलेस तकनीक के कारण क्रांति आयी। आज के वेब को वायरलेस वेब भी कहा जाता है। मोबाइल फोन के उपभोक्ताओं की संख्या पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ी है। इसमें और विस्तार देखा जा रहा है, लिहाजा इंटरनेट को मोबाइल तकनीक के साथ सामंजस्य बैठाने योग्य बना दिया गया है। लैपटॉप कंपयूटर इस्तेमाल करने वाले ग्राहकों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। वाईफाई तकनीक यानी वायरलैस फिडेलिटी तकनीक ने इंटरनेट को बेतार कर दिया है। आने वाले दिनों में यह तय माना जा रहा है कि डूंगल या किसी और माध्यम की जरूरत इंटरनेट के लिए नहीं रहेगी। वह मोबाइल फोन के नेटवर्क की तरह कमोबेश हर जगह उपलब्ध रहेगा।

मोबिलिटी यानी गतिशीलता आज के जनसंचार की एक प्रमुख विशेषता बन गई है। वाईफाई इस दिशा में पहला कदम माना जाता है। इसके आगे वाईमैक्स तकनीक है जो बेतार इंटरनेट को समस्त महानगरीय, शहरी, उपशहरी क्षेत्रों तक सुगम बना देगा। वाईफाई डिवाइस को कनेक्ट करने के लिए मद्धम शक्ति (लो-पावर) रेडियो सिग्नलों का इस्तेमाल करता है, वहीं वाईमैक्स वाईफाई जैसा ही है लेकिन कम दूरी या डेढ़ सौ से दो सौ फुट की दूरी को कवर करने के बजाय 16 किलोमीटर जितनी लम्बी दूरियों को अपने दायरे में लेता है। इस तरह वाइमैक्स नेटवर्क आज के सेलफोन नेटवर्क की तरह व्यापक होगा। 

ब्रॉडबैंड की इसी व्यापकता ने वेब 2.0 को संभव किया है। विकसित होता इंटरनेट और इसका नया इंटरैक्टिव इस्तेमाल ही वेब 2.0 के रूप में जाता है। ये एक प्रारंभिक शब्दावली है और इसकी कई व्याख्याएं की जा सकती हैं लेकिन आमतौर पर दूसरी पीढ़ी यानी टूजी वेब सेवाओं को ये नाम दिया गया है। इसके तहत शेयरिंग और सहयोग आधारित सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटें (फेसबुक, ट्विटर आदि), यूजर जनेरेटड वेबसाइटें जैसे यू ट्यूब (इसकी थीम ही है-ब्रॉडकास्ट योअरसेल्फ यानी खुद को प्रसारित करो) और सामूहिक भागीदारी की विकिपीडिया जैसी वेबसाइटें आती हैं। डब्ल्यूएपी, वैप मोबाइल फोन जैसी वायरलेस तकनीक में इंटरनेट संभव हो गया है। मल्टीमीडिया मैसेजिंग सिस्टम (एमएमएस) मोबाइल फोन में उपलब्ध ऐसी तकनीक है जिसके जरिए टेक्स्ट, ऑडियो, वीडियो और तस्वीर सबकुछ भेजा जा सकता है। मोबाइल और सेलफोन-रेडियो, डिजिटल कैमरा, रिकॉर्डर, एमपी-3 प्लेयर, मूवी प्लेयर, वीडियोस्ट्रीमिंग डिवाइस, टीवी प्रोग्राम, जीपीएस, इंटरनेट-एक साथ कई रूपों में काम कर रहे हैं। 

पहली पीढ़ी के वेब यानी वेब 1.0 में यूजर कंटेंट को उपभोग करते थे लेकिन वेब 2.0 में यूजर कंटेंट बना रहे हैं और उसे परस्पर शेयर भी कर रहे हैं। वेब 1.0 स्थिर था, वेब 2.0 डायनेमिक यानी गतिशील है। ऐसा नहीं है कि वेब 2.0 की गतिशीलता और तीव्रता और बहुआयामिता सिर्फ उपभोक्ताओं, यूजरों और ऑडियंस के लिए ही है और सबकुछ जनहित में ही है। वेब 2.0 एक व्यावसायिक उपक्रम के रूप में बहुत सफल है और बड़ी-बड़ी कंपनियां वेब के इस नए अवतार से भली भांति परिचित हैं। वे वेबसाइटों पर विज्ञापनों के जरिए या सोशल मीडिया नेटवर्कों में अप्रत्यक्ष रूप से राजस्व बटोरेने के लिए उत्सुक रहती हैं। वेब का बाजार बहुत तीव्र गति से फल-फूल रहा है। इंटरनेट एडवर्टाइजिंग एक बड़ा बिजनेस बन गया है। अरबों-खरबों डॉलरों का कारोबार इंटरनेट से जुड़ा है।


बुधवार

बुलेटिन बोर्ड (Bulletin Board)

Dr Awadhesh K. Yadav (Assistant Professor)     अक्टूबर 23, 2024    

 बुलेटिन बोर्ड ऑनलाइन सार्वजनिक इलेक्ट्रॉनिक मंच है, जो अपने उपयोगकर्ताओं को संदेश पोस्ट करने तथा पढ़ने की अनुमति देता है। जब कोई सूचना को इंटरनेट के माध्यम से अनेक उपयोगकर्ताओं को एक साथ उपलब्ध करानी होती है, तो उसे बुलेटिन बोर्ड पर पोस्ट कर दिया जाता है। इस संदेश को बुलेटिन बोर्ड पर अनेक इंटरनेट उपयोगकर्ता देख-पढ़ सकते है। उन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते है। प्रतिक्रिया भी अनेक उपयोगकर्ताओं को देखने, पढ़ने के लिए उपलब्ध होती है। एसोसिएशन फॉर क्वालिटेटिव रिसर्च ने इसे ऑनलाइन फ़ोरम के रूप में परिभाषित करता है, जिसमें शोध प्रतिभागी सवालों के जवाब देने, विचारों व जानकारियों को एक दूसरे के साथ साझा करने के लिए लॉग कर सकते हैं। इस प्रक्रिया में एक मॉडरेटर भी भाग लेता है, जो उपयोगकर्ताओं के बातचीत को निर्देशित करता है। मॉडरेटर सवालों का जवाब देने और प्रासंगिक डेटा को सुविधाजनक बनाने में मदद करता है। 

सामान्यतः एक बुलेटिन बोर्ड किसी एक विषय विशेष पर केंद्रीत होता है। इसका उद्देश्य सम्बन्धित विषय की समस्त सूचनाएं उपयोगकर्ताओं को उपलब्ध कराना होता है। इसे विश्व के किसी भी कोने में बैठकर देखा-पढ़ा जा सकता है। कुछ बुलेटिन बोर्ड पर अनेक उपयोगी सॉफ्टवेयर सशुल्क उपलब्ध होते हैं, तो कुछ पर निःशुल्क। इन्हें कोई भी उपयोगकर्ता अपने कंप्यूटर पर डाउनलोड कर सकता है।


रविवार

कैमरा के प्रकार (Types of Camera)

Dr Awadhesh K. Yadav (Assistant Professor)     अक्टूबर 20, 2024    

 कैमरा (Camera) फोटोग्राफी के दौरान उपयोग किये जाने वाला एक उपकरण है। फोटोग्राफी के लिए पीनहोल कैमरा, व्यू कैमरा, काम्पैक्ट कैमरा, टविन लैन्स रिफ्लैक्स कैमरा, सिंगल लैन्स रिफ्लैक्स कैमरा, इन्सटैंट कैमरा, डिजिटल कैमरा का उपयोग किया जाता है।  

  1. पिनहोल कैमरा (Pinhole Camera) : पिनहोल कैमरा एक साधारण कैमरा होता है, जिसमें लैंस नहीं लगा होता है। यह एक छोटे से एपर्चर (तथाकथित पिनहोल) की मदद फोटोग्राफी का कार्य करता है। अन्य शब्दों में कहें तो यह एक छोटे से छिद्र वाला लाइट-प्रूफ बॉक्स होता है, जिसमें दृश्य से प्रकाश एपर्चर के माध्यम से गुजरता है और बॉक्स की दूसरी दिशा में उल्टी छवि का निर्माण करता है। बाद में इसमें एक लैंस का उपयोग किया जाने लगा।

  2. व्यू कैमरा (View Camera: यह कैमरे बड़े आकार का होता हैं, जिसे स्टैण्ड पर लगाकर फोटोग्राफी का कार्य किया जाता है। व्यू कैमरा में व्यूफाइंडर नहीं होता है। फिल्म की स्थान पर एक व्यूफाइंडर स्कीन लगी होती है, जिसमें विषय-वस्तु या दृश्य को देखकर फोटोग्राफी की जा सकती है। इस कैमरे के व्यूफाइंडर में सीधे खड़े व्यक्ति का दृश्य उल्टा दिखाई देता है अर्थात सिर नीचे और पाँव ऊपर होता। ऐसे कैमरों को आगे और पीछे दोनों भागों में अलग-अलग संतुलित किया जाता है। व्यू कैमरा का सबसे बड़ा दोष यह है कि इसमें न तो बहुत नजदीक (Extreme Closeup) की फोटोग्राफी की जा सकती है और न तो इनमें क्षेत्रीय-गहनता (Depth of Field) का ही सही अनुमान लगाया जा सकता है।
  3. कॉम्पैक्ट कैमरा (Compact camera) : यह छोटे आकार का कैमरा होता है, जिसमें लैन्स बदले की सुविधा नहीं होती है। हालांकि कॉम्पैक्ट कैमरा में अच्छी किस्म का लैन्स लगा होता है। बाजार में ऐसे कॉम्पैक्ट कैमरा भी उपलब्ध है, जिनमें जूम लैन्स पहले से ही लगा होता है। इनकी क्षेत्रीय-गहनता (Depth of Field) तीन फीट से अन्तत तक होती है। इनमें अच्छी फोटोग्राफी की क्षमता होती है। बाजार में ऐसे कॉम्पैक्ट कैमरा भी उपलब्ध हैं, जिनमें एक्सपोजर को नियन्त्रित करने के लिए स्वः चालित प्रणाली लगी होती है। कुछ ऐसे मॉडल भी आ गये हैं, जिनमें पहले से लगी फ्लैश की सुविधा होती है। इसके अलावा फोटोग्राफ पर दिन और वर्ष मुद्रित करने की सुविधा भी होती है। कॉम्पैक्ट कैमरा उन व्यक्तियों के लिए उपयोगी है, जिन्हें कभी-कभार फोटोग्राफी करनी होती है। ऐसे कैमरे से फोटो खींचना बहुत आसान होता है। विषय वस्तु को व्यू फाइंडर में से देखते हुए बटन दबा कर फोटो खींची जा सकती है। एपरचर या शटर की गति को बदलने की आवश्यकता नहीं होती है। कॉम्पैक्ट कैमरों में फोटोग्राफी के दौरान उपभोक्ताओं को कुछ असुविधाओं का सामना भी करना पड़ता हैं। जैसे- इन कैमरों में अलग से फिल्टर, लैन्स, फ्लैश आदि लगाने की सुविधा नहीं होती है। इनसे खींचे गए फोटोग्राफ भी उतने शार्प नहीं होते, जितने कि किसी SLR कैमरा के होते हैं, क्योंकि कॉम्पैक्ट कैमरे का रैजोलूशन काफी कम होता है। कॉम्पैक्ट कैमरे का प्रयोग करके अच्छी फोटोग्राफी नहीं सीखी जा सकती, क्योंकि इसमें एपरचर, प्रकाश मीटर व शटर की गति का आवश्यकतानुसार अभ्यास करने की सुविधा नहीं होती है। पहले से लगे लैंस, फ्लैश आदि की एक निश्चित सीमा होती है। इनमें सीमित एपरचर की सुविधा के कारण तेज गति की फिल्म का प्रयोग किया जाता है। 
  4. टविन लैन्स रिफ्लैक्स कैमरा (TLR- Twin Lens Reflex Cameraa) : TLR कैमरा में दो लैन्स होते हैं, जिनकी फोकल लैन्थ एक समान होती है। दोनों लैन्स एक-दूसरे के ऊपर लगे होते हैं। इनकी धूरी समतल और एक-दूसरे के समानान्तर होती है। ऊपर वाले लैन्स का प्रयोग विषय वस्तु या दृश्य को देखते हुए कम्पोज करने के लिए किया जाता है, जबकि नीचे वाले लैन्स का प्रयोग फिल्म पर वास्तविक प्रतिबिम्ब बनाने के लिए किया जाता है। SLR कैमरे की तरह TLR कैमरे में भी ऊपर वाले लैन्स के माध्यम में खुले एपरचर के कारण प्रतिबिम्ब धुंधले शीशे की समतल स्क्रीन पर बनता है। यद्यपि टविन लैन्स रिफ्लैक्स कैमरा में 120 या 220 आकार की फिल्मों का प्रयोग किया जाता है, इनमें ऐसा प्रावधान भी किया जाता है कि 35 मि.मी. आकार की फिल्म प्रयोग की जा सके। अधिकतर टविन लैन्स रिफ्लैक्स कैमरों में लैन्स नहीं बदले जा सकते, परन्तु कुछ निर्माताओं ने ऐसे टविन लैन्स रिफ्लैक्स कैमरे बनाए हैं, जिनमें लैन्स बदले जा सकते हैं। रोलिफ्लैक्स, मैमिया और हैसलब्लैंड प्रसिद्ध टविन लैन्स रिफ्लैक्स कैमरे हैं।
  5. सिंगल लैन्स रिफ्लैक्स कैमरा (SLR- Single Lens Reflex Camera) : अपने छोटे आकार और अन्य गुणों के कारण सिंगल लैन्स रिफ्लैक्स (SLR) कैमरा बहुत ही लोकप्रिय है। इस कैमरे की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसके व्यू फाइंडर में हम  जैसा प्रतिबिम्ब देखते हैं, वैसा ही फोटोग्राफी खींचता है। SLR कैमरों में विषय वस्तु को देखने और फोटो को खींचने के लिए एक ही लैन्स का प्रयोग किया जाता है। यही कारण है कि इस कैमरे से हम उपयुक्त कम्पोजिशन बना सकते हैं और फोटो खींचते समय फोकस को शार्प करते हुए Depth of Field भी देख सकते हैं। लैन्स के पीछे लगा दर्पण (Plane Mirror) धुंधले शीशे की स्क्रीन पर प्रतिबिम्ब बनाता है और शटर का बटन दबाते ही शीशा ऊपर की ओर उठ जाता है। इस प्रकार, प्रकाश की किरणें फिल्म पर पड़ती हैं और दृश्य अंकित हो जाता है। आमतौर पर ऐसे कैमरों में यह दर्पण तब अपनी वास्तविक स्थिति में लौटकर आता है, जब फिल्म अगले फोटो के लिए आगे घूम जाती है, परन्तु मंहगे SLR कैमरों में ऐसा नहीं हैं। उनमें दर्पण ऊपर उठने के तुरन्त बाद अपनी वास्तविक स्थिति में लौट आता है। इन कैमरों में फोकल प्लेन शटर का प्रयोग किया जाता है। SLR कैमरे की एक मुख्य विशेषता यह है कि इसके लैन्सों को बदलने की सुविधा होती है। 
  6. पोलेराइड कैमरा (Polaroid Camera) : पोलेराइड कैमरों को इन्सटैंट कैमरा भी कहा जाता हैं क्योंकि इनके द्वारा खींचे गए फोटोग्राफ के प्रिंट्स को कुछ ही देर में प्राप्त किया जा सकता है। डार्करूम में जाकर फिल्म डेवलेप कर नेगेटिव बनाने और फोटोग्राफ प्रिंट बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। पोलेराइड कैमरे का आविष्कार सन् 1947 में संयुक्त राज्य अमेरिका के डा. एडविन लैंड (Dr- Edwin Land) ने किया था। ऐसे कैमरे से ब्लैक एंड व्हाइट और रंगीन दोनों प्रकार के फोटोग्राफ खींचे जा सकते हैं। इनमें फ्लैश का प्रयोग किया जा सकता है। इनके द्वारा खींचे गए फोटोग्राफ गुणवत्ता की दृष्टि से परपरागत कैमरों के खींचे गये फोटोग्राफ की तरह नहीं होते हैं। फिर भी, इनसे जो फोटो खींचे जाते हैं वे स्पष्ट होते हैं। यह कैमरा कम समय में फोटोग्राफ खींचने के लिए अच्छा माना जाता है। पोलेराइड कैमरों में मिनिएचर लैब होता है, जो तुरंत फोटोग्राफ उपलब्ध कराता है।
  7. डिजिटल कैमरा (Digital Camera: डिजिटल कैमरे कंप्यूटर-क्रांति की देन हैं। फोटोग्राफी विधा में इन कैमरों के आगमन से हलचल मच गई है। फोटो पत्रकारिता के लिए डिजिटल कैमरे उपयुक्त होता है। इनमें न तो फिल्म लगाने की आवश्यकता होती है और न ही उसे डेवलप कराने की। क्लिक करने ही सामने का दृष्य कैमरे की मेमोरी में सेव हो जाता है, फिर उसे कंप्यूटर में डाउनलोड किया जा सकता है। मन चाहे दृश्य को ही कैमरे की मेमोरी में रखने और अनचाहे दृश्य को डीलीट (Delete) करने की सुविधा होती है। इसके प्रिंट की क्वालिटी भी आकर्षक होती है। डिजिटल कैमरों में दृश्य देखने के लिए व्यूफाइंडर के अलावा स्क्रीन भी लगा होती है। दृश्य को कंपोजिशन करने और अनावश्यक चीजों को निकालने की सुविधा उपलब्ध भी होती है। यह कैमरा काफी कीमती और रख-रखाव की दृष्टि सेे नाजुक होता है। इनमें कुछ ऐसे कैमरे होते हैं जिनमें फिल्म के स्थान पर फ्लापी लगाई जा सकती है। एक फ्लापी को भर जाने के बाद बदला भी जा सकता है। फ्लापी को कंप्यूटर में डाउनलोड करके प्रिंट आउट लिया जा सकता है। 

वर्तमान समय में सस्ते डिजिटल कैमरें भी बाजार में उपलब्ध हैं। इन कैमरों में लो (Low) लाइट में भी शॉट लेने की अद्भुत क्षमता होती है। लाइट के प्रति ये अत्यंत संवेदनशील होते हैं। जिस लाइट में SLR कैमरों से शॉट लेना संभव नहीं है, उसी लाइट में भी डिजिटल कैमरों से फोटोग्राफी की जा सकती है। लेकिन इनकी भी अपनी सीमाएं हैं। 

डिजिटल और परम्परागत फोटोग्राफी में अंतर

सुभाष सप्रू ने अपनी पुस्तक ‘फोटो पत्रकारिता’ में डिजिटल और पारंपरिक फोटोग्राफी के महत्त्व को निम्न प्रकार दर्शाया है-

  1. डिजिटल कैमरों में सी.डी. (Compact disk) पर प्रतिबिम्ब इलैक्ट्रॉनिक संकेतों से बनता है, जबकि पारंपरिक कैमरों में फिल्म पर लगे घोल (Emulsion) पर प्रकाश पड़ने पर रासायनिक प्रक्रिया होती है। 
  2. डिजिटल फोटोग्राफी में फोटो खींचने के उपरांत प्रतिबिम्ब को दर्ज करने तथा उसे स्टोर करने के लिए अलग-अलग स्थान होता है, जबकि पारंपरिक फोटोग्राफी में फिल्म एक्सपोज करने के बाद प्रतिबिम्ब को उसी स्थान पर स्टोर किया जा सकता है।
  3. डिजिटल कैमरों में प्रिंट बनाने से पहले नेगेटिव बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती, जबकि पारंपरिक कैमरों में प्रिंट बनाने के लिए नेगेटिव बनाना आवश्यक है।
  4. डिजिटल कैमरों में प्रिंट बनाने के लिए न ही रसायनों की आवश्यकता होती है और न ही डार्करूम की। जबकि पारंपरिक कैमरों में इसकी आवश्यकता अहम् होती है।
  5. डिजिटल फोटोग्राफी में रसायनों का प्रयोग न होने के कारण पर्यावरण के प्रदूषण की संभावना नहीं रहती जबकि पारंपरिक फोटोग्राफी में रसायनों का प्रयोग होने के कारण पर्यावरण प्रदूषित होता है।
  6. डिजिटल फोटोग्राफी में मैमोरी स्टिक या फ्लापी को कंप्यूटर में डालकर किसी फोटो इमेजिंग साफ्टवेयर की सहायता से फोटो में तब्दील करके उसका प्रिंट निकाला जा सकता है, जबकि पारंपरिक फोटोग्राफी में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। 
  7. डिजिटल कैमरों से कम प्रकाश में भी फ्लैश का प्रयोग किए बिना फोटो खींच सकते हैं, जबकि पारंपरिक कैमरों से कम प्रकाश में फोटो खींचना काफी कठीन कार्य है।
  8. डिजिटल कैमरो से खींचा गया फोटो यदि अच्छा न लगे तो उसे उसी समय मिटाकर उसके स्थान पर दोबारा खींच सकते हैं। जबकि पारंपरिक फोटोग्राफी में दोबारा फोटो खींचने के लिए नया नेगेटिव बनाना पड़ता है।


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