विज्ञापन का उद्भव और विकास समाज और संचार माध्यमों के साथ जुड़ा है, क्योंकि जैसे-जैसे भाषा, लिपि और संचार माध्यमों का विकास होता गया, वैसे-वैसे विज्ञापन का भी। भाषा और लिपि के अभाव में मानव अपने विचारों को पेड़ और चट्टानों पर विभिन्न प्रकार की आकृतियां बनाकर विज्ञापित करता था। भारत में स्वास्तिक और यूरोप में क्रास के चिन्ह धार्मिक प्रचार प्रतीक के रूप में वर्षों तक प्रचलित रहे। इसके अलावा बर्तनों और दीवारों पर बनी कलाकृतियां वैचारिक विज्ञापन का उदाहरण हैं।
भारत में आधुनिक विज्ञापन के विकास का कोई प्रमाणिक इतिहास उपलब्ध नहीं है। फिर भी सन् 1556 में पुर्तगालियों द्वारा गोवा में पहला प्रेस लगाये जाने का प्रमाण मिलता है। सन् 1780 में प्रकाशित भारत के पहले समाचार पत्र ‘बंगाज गजट’ में खोया और पाया, लाटरी, आवश्यकता है, सार्वजनिक नीलामी इत्यादि के विज्ञापन प्रकाशित होते थे। सन् 1784 से 19वीं शताब्दी के आरंभ तक समाचार पत्रों में तत्कालीन समाज में विद्यमान बुराईयों, धार्मिक पुस्तकों और इलाज के लिए दवा आदि पर केंद्रीत विज्ञापन प्रकाशित होते थे। सन् 1890 में छपने वाले विज्ञापनों में लगभग 50 प्रतिशत विज्ञापन एलोपेथिक दवाओं से संबंधित अंग्रेजी भाषा में होते थे। इन विज्ञापनों में मॉडल के रूप में अंग्रेज महिलाओं और पुरुषों के चित्र प्रकाशित किए जाते थे।
